Wednesday, November 21, 2018

रूठकर आईना शीशा हो गया,

बेहतर नहीं होती है सिर्फ़ सोचकर,
ज़िंंदगी को कर हसीन तू तराशकर

वो नफ़ीसा, बदनिसीबी और तेवर,
खरीदे नहीं जाते गहने, ज़ेवर बेचकर

रूठकर आईना शीशा हो गया,
लाए थे बाज़ार से सोच समझकर

हो मन्नते पुरी कभी तो लौट जाऊंगा,
निकले थे घर से हम भी यह बात ठानकर

ग़म के निशां कहकशा राते मदभरी,
चलना नहीं सिखा कभी होश संभलकर

मन लगे दुनिया में तो कुछ गाले-झूमले,
मिलते नहीं हसीन पल एकबार गुज़रकर

गर मिल गया, मिला नहींं तो क्या हुवा भला,
गिनता नहीं है साँँस कोई एहसान समझकर

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