Sunday, November 21, 2021

सफ़र के बाद

 देर गुज़र के सफ़र के बाद

मिला हैं तर्जुबा एक असर के बाद,

खुली जो आँख तो होश आया

था फिर वहीं ख़्वाब सहर के बाद,

एक खुशनुमा गहरी सांस के लिए

तरस जाएंगे आखरी शजर के बाद,

लौट के जाएं भी तो भला कैसे

कौन दिखायेगा राह हमसफ़र के बाद,

बस यही शायद अब बची हैं एक उम्मीद

मिल जायेंगी मंज़िल इसी समर के बाद । 





Friday, May 1, 2020

थोड़ा और ...

सबको थोड़ा और चाहिए,
वक्त, इज्ज़त, पैसा, आराम, शोहरत
थोड़ा और..!
कुछ ना कुछ और पाना है
जो है उस से थोड़ा और,
बहुत कुछ खोकर बस थोड़ा और,
सब कुछ अगर दाव पर लगे तो चलेगा,
पर कुछ और,
ये कुछ और का सिलसिला कभी ख़तम नहीं होता,
और बढ़ता रहता है अपनी ही गती से,
ये जो सिलसिला है,
स्वभवतः इसको कुछ नहीं करना है हासिल,
बस चाह बढ़ानी है, भोगी की,
इसको दरियां पार नहीं करना,
बस गोते लगाते रहना हैं,
कुछ देर और,
और गहराई में,
जब थोड़ा थोड़ा कर बहुत कुछ मिल जाता हैं,
तो नज़र खोजती रहती है, जों नहीं मिला उसे,
जो मिला उसके परे, अलग, पार,
ढूंढ़ती रहतीं है कुछ और,
आज का आनंद खो जाता है,
उस कुछ और में जिसके मिल जाने पर भी कभी कोई
समाधान नहीं होगा आंनद नहीं होगा,
सबको थोड़ा और चाहिए, कुछ और ...!


याद आयेगी

हो गई एक रूह आज़ाद, याद आएगी
है बाकी कुछ बात, मुलाक़ात याद आएगी,

उड़कर पंछी पिंजरे से आसमां में खो गया,
जो संग गुजरी रात-ए-जज़्बात याद आएगी,

तुमसे मिलने जुलने का सिलसिला रहे जारी,
मगर, तुम्हारे जाने की हर बात याद आएगी,

(इरफ़ान खान की याद में)

अफ़वाह

क्या बुरा हैं अगर ये अफ़वाह उड़ा दी जाएं,
की पानी मिलेगा स्वच्छ और ताज़ा
जब तक ये दुनिया कायम है,
और मिलेगी रूहानी हवा
जब तक सांस महफूज़ हैं,
सबको मिलेगा काम और रोज़गार,
नहीं जाना पड़ेगा स्कूल के बाहर
अगर नहीं भी हैं पैसे तो,
और होगा इलाज़
हर बीमारी का सभी का बराबर,
मिलेगा एक आसरा सभी को
और ना सोएगा कोई भी भूखा कभी,
ना होंगे कहीं पर भी दंगे और फसाद
मज़हब के नाम पर,
और ना होगा कहीं पर भी
भेदभाव किसी बुनियाद पर,
ना होगा भ्रष्टाचार
और ना किसी पे अन्याय होगा,
जो भी होगा सबके सामने
खुला खुला व्यवहार होगा,
सब को मिलेगा मौका
जीने का अपने अपने तरीकों से,
और रहेगी आज़ादी
अपनी सोच रखने की,
और कभी किसी को
ना परखा जाएगा
उस की सोच से,
होगी शामिल दुनियां भी
सभी के सुख और दुख में,
और ना किसी के हक
पर गाज कोई आएगी,
सब कुछ ठीक हो जाएगा
इस लॉकडॉउन के बाद
रहेंगे मिल जुल कर
और देंगे सभी का साथ,
किसी से जान से बढ़कर
और कोई भी बात ना होगी,
फिर शायद दुनियां भी
अपनी सही सलामत होगी ।
क्या बुरा हैं अगर ये अफ़वाह उड़ा दी जाएं..


(हम ’ने दूंढ लिया है लोगों के दुःख दर्द का इलाज , क्या बुरा है जो ये अफवाह उड़ा दी जाए ", ये शेर मैंने फ़िल्म घात के शुरुवात में सुना था, ये किसने लिखा है पता नहीं कर पाया।  🙏 साभार )

सत्य क्या हैं ?

क्या मैं सत्य से परिचित हूं ?
जो दिख रहा हैं आज, वो किसका सत्य हैं?
मैंने किस की बात को सत्य माना?
क्यों...?
क्या मेरा अपना अनुभव ही सत्य हैं?
क्या सत्य की सापेक्षता उसका रूप बदल देगी?
क्या किसी का प्रभाव मेरा सत्य हैं?
क्या किसी की राय मेरा सत्य हैं?
मेरा नज़रिया मेरा सत्य है?
मेरा नज़रिया बदला तो मेरा सत्य बदल जाएगा?
सत्य एक अनुभव हैं, तो मेरा कितना हैं?
लोगों को मरते देख मैं सिसक जाता हूं और
मारने की बात करता हूं, क्यों?
किसी को, गाली का ज़वाब गाली से देता हूं,
ना दू तो नपुंसक कहलाता हूं,
क्या मेरे पुरुषार्थ का अपना कोई मतलब नहीं,
सब किसी और के मतलब पर निर्धारित,
मैं भावूक, असहाय,
किसी अन्याय के ख़िलाफ़ जब आवाज़ उठाता हूं,
तो मैं किस न्याय की बात करता हूं?
किस के पक्ष में जाता हैं वो न्याय?
कैसे हो जाता हैं समाधान?
कैसे होता है समर्थन न्याय और अन्याय का?
क्या मैं सत्य से परिचित हूं ?
जो दिख रहा हैं आज वो किसका सत्य हैं?

फासला

कल और आज में एक फासला हुआ करता था,
एक रात होती थी जिसमें ख़्वाब हुआ करता था ।

पूरे आसमान की जिस से हमे पहचान होती थी,
बहुत ख़ूबसूरत सा एक चांद हुआ करता था ।

अब तो हो जाते है मायूस ज़रा ज़रा की बातों से,
सुना है किसी ज़माने में कभी ग़म हुआ करता था ।

हो जाती थी शाम तो अपने घर लौट आते थे वो भी
एक वक्त था जब परिंदों का घौसला हुआ करता था।

वो लोग अमर है, किस्सों में कहानियों में किताबों में,
देखो, जान से बढ़कर जिनका हौसला हुआ करता था।

तुम्हारा हैं क्या यहां?

तुम्हारा हैं क्या यहां ?
ये जिस्म, ये सांस, ये रूह,
ये हवा, बादल, दरिया, ये मंज़र,
चांद, सूरज, तारे, या गगन ?
अमाप, असीम, अनंत का,
कुछ अंदाज़ा है ?
तुम हो कौन?
तुम्हारा हैं क्या यहां?


ज़रूरी है ?

ध्यान से देखो, तैयारी अपनी पूरी है,
क्या हर जंग में यूं जान की बाज़ी ज़रूरी है ?

जो हो जाएं जो बटवारा तो समझेगा
मिलजुल कर रहना कितना ज़रूरी है,

हर कोई उलझन में फसा अपनी अपनी,
फिर भी समझे ज़िन्दगानी नूरी है,

अपनें भीतर झांकोगे तो समझोगे
 कितना हैं फासला और दूरी है,

फुरसत से जो मिलो कभी तो कह देंगे
अरसे से जो बात एक अधूरी है,

मेरे हिस्से की दुनिया

फ़िलहाल,
दुनियां मेरे हिस्से की और भी बड़ी हो गई हैं,
अब काफ़ी समय रहता है
बहुत कुछ करने के लिए,
जैसे एक संदूक, जिस में मेरा बचपन
महफूज़ रखा था
उस से मुलाक़ात होती है बार बार,
स्कूल की यादें, वहां से जुड़े लोग,
कुछ ख़ास निशानियां,
सब से मुलाक़ात होती हैं, बात होती है,
अब याद कर लेता हूं उन जगहों को,
जहां जाकर ज़िन्दगी नई सी हो गई थी,
और फ़िर नई हो जाती हैं,
चैन से सुकून से फ़ुरसत से चल रहा है सब,
कभी खाना बना लिया, कभी गाया, बजा लिया,
कभी सोए, तो कभी पूरी रात को जी लिया,
अच्छी बातें, बहुत सी किताबें, कुछ खिलौने, सब
ना कहीं जाने की चिंता,
ना कहीं पोहोचने का टेंशन,
पड़े है मस्त, अपनी जगह पर,
फ़िर सोचू तो लगता है,
कई ऐसे भी होंगे
जिन्हें इनके बजाय
खालीपन मिला होगा, अकेलापन,
चिंता मिली होगी, डर मिला होगा,
भूख मिली होगी, लाचारी मिली होगी,
परेशानियां मिली होगी
दुनियां उनके हिस्से की क्या हो गई होगी? 

परिंदा

कुछ करना मेरे बस में, अगर नहीं है हुज़ूर
खुश रहना लेकिन मेरे, बस में ही है हुज़ूर।

आज़ाद परिंदा बन कर उड़ने को चाहे जी
लेकिन भलाई सब की, घर रहने में हैं हुज़ूर।

प्रवाह

विश्वाच्या प्रवाहात
अविरत
वाहणाऱ्या अनेकानेक
स्थूल आणि सूक्ष्म घटकांच्या
अंशाचा एक अंश
असलेला
प्रत्येक "मी" जेव्हा
खूप मोठा होऊन बसतो,
सर्वात महत्त्वाचा
भाग असल्याचा अनुग्रह आणि परिग्रह
करीत संपूर्ण आयुष्यभर
या प्रवाहापासून
स्वतःला विभक्त
समजून
हे जीवनचक्र
पुर्ण करण्याचं
श्रेय मिळवण्याची
धडपड करतो
तिथेच राहतं
एक अपूर्ण वर्तुळ
एका अनाकलनीय नात्याचं .!
माझं आणि त्या प्रवाहाचं नातं.

दर्शक

इधर उधर की बातें सुनकर दिल को बेहलाते हो
मुफ़्त की राय बनाते हो, तुम दर्शक कहलाते हो,

तेरे मेरे के चक्कर में हालात काफी बिगड़ गए
रखकर बात उल्टी सीधी  समर्थक कहलाते हो,

जो दोहराते हो बार बार एकतरफा बात बेवजह, तो
एक समय के बाद फिर तुम निरर्थक कहलाते हो ।


ना हम वो रहेंगे

अगर हो भी जाए, सब  पहले जैसा
ना तुम वो रहोगे, ना हम वो रहेंगे ।

यहीं है खुद्गाई, दुनियां चलती रहेगी
ना सुखन वो रहेंगे, ना ग़म वो रहेंगे ।

कभी ना कभी वक्त बदलेगा करवट
ना सजन तुम रहोगे, ना सनम वो रहेंगे।

दुनियां पहेली , बुझी ना बुझाए
तुम वो सब समझना, ना हम जो कहेंगे।

शोर

बाहर जो शोर था, अब भीतर हैं
हर कोई बेचैन,
वज़ह अलग,
सलिका अलग,
नतीज़ा अलग,
बाहर जो शोर था, अब भीतर हैं

अनंत

अनंताचे आपण करावे स्मरण
मिळेल आधार नश्र्वरासी .!
मिळूनी सर्वासी करावे समान
कशाला चढाओढ भौतिकाची !

जाणती जे मर्म धर्मोपासनेचे
कधी ना कुणाला दुःख देती !
असावे जगासी बसावे एकांती
रहावी सदा जोड साधनेची !

असावे आनंदी सदा आत्मनाने
असुद्यावी गोडी चिंतनाची !
नभासी भिडावे मातीत रुजावे
जपावे हे नाते निसर्गाशी !


घर में रहे

अब ये सोचो,
मन से निकलो घर से बाहर,
स्टेशन की ओर चलो,
जैसे रोज़ जाते थे वैसे,
या फ़िर पैदल,
ज़रा याद करो के
रास्ते भर में क्या क्या दिखाई पड़ता था,
हर कुछ देखने की कोशिश करो,
ज़रा गौर से सोचो,
एक एक नज़र आती जगहों को याद करो,
उनसे जुड़ी कोई  बात याद आती होगी,
किसी दुकान का नाम, कोई पोस्टर,
चौराहा, तालाब, गार्डन, मिठाई की दुकान,
पानी पुरिवाला, आइस्क्रीम वाला, सिनेमा हॉल,
मंदिर, मस्ज़िद, चर्च,विहार, स्कूल,
किताबों की दुकान, कुछ खास लोग,
बहुत सारी बातें याद होगी
बड़ा अच्छा लगा होगा याद करके,
तो इनको अगर दुबारा जीना चाहते हो,
तो कुछ दिन घर में ही रहो ।


संयम

संयम एक आभास है शायद ,
स्वभाव के विपरीत
जो सभी नियम बनाएं गए,
उनमें से एक संयम भी लगता हैं।
कुछ ना करने के निष्क्रिय भाव को
बहुत कुछ करने का लक्षण माना गया।
किसी कृति का ना होना कैसे वास्तव मान लें,
कैसे समझा जाएं के संयम एक सत्य हैं।
जो सिर्फ और सिर्फ विचारों में हो
उसे दर्शाएं कैसे, माने कैसे, समझे कैसे?
इसका तो कोई तटस्थ और स्वतंत्र रूप हैं ही नहीं।
संयम एक आभास है शायद...!

घर

जिसको अपना घर कहते हों कितना जानतें हो?
क्या कभी देखा है?
बाथरूम के ऊपर जो पानी की टंकी रखी है
वहां नए पुराने खिलौने, बर्तन, पत्थर,
टाईल्स के टुकड़े, काला हीट,
पुरानी गुड़िया के कपड़े,
जूते की पॉलिश की डिब्बी,
जिसके अंदर की पॉलिश बेहद कड़क और ख़राब हो चुकी,
बालों में रंग लगाने वाली कंगी और ब्रश,
सूखे चुने से आधी भरी हुई एक छोटीसी बाल्टी,
जिसमें एक पुराना, अधमरा ब्रश,
तुलसी का पेड़ लगाने के लिए जो मिट्टी लाए थे थैली में भरकर उसमें की कुछ बची हुई वहीं रखी हैं,
और कितना कुछ है वहां पानी की टंकी के साथ साथ...
घर में और भी कई जगहों पर हमारी नज़र नहीं जाती कई बार,
मन का भी यही हाल तो नहीं, क्या कुछ भरा पड़ा होगा अंदर काम के चीज़ों के अलावा ...!
जिसको अपना घर कहते हों कितना जानतें हों ।

खुशी

बिजली जैसे तार बदन में जब दौड़े
सांस रुक - रुक चले फिर भी ना संभले,

रोम रोम में ऊर्जा पूरी समाजाएं
सृष्टि से हम एक रूप जब हो जाएं,

किसी बात का कोई हमको एहसास ना हो
ऐसे जानो जैसे कोई पास ना हो,

सब कुछ कर जाने को तब जी चाहता हो
दुनिया पर, मर मिट जाने को जी चाहता हो,

इसी बात को एहसास ख़ुशी का कहते हैं
जो खुश होते है, इसी हाल में रहते हैं।


जगणे अपुले

साधे सोपे करून घ्यावे जगणे अपुले
तरच कळावे लोकासी हे म्हणणे अपुले,

हा ही, तो ही प्रयत्न आता करून झाला
जगास नाही कळले  काही करणे अपुले,

भटकंतीला कसला आला वेळ, काळ, पण
 कधीच नाही कुणा उमगले फिरणे अपुले,

ना नुकसान, ना हानी कुणाची केली आम्ही
जगास नाही रुचले तरीही हरणे अपुले !


आस

कैवल्याची आस मनी निरंतर,
तरी नसे वान विचारांची !
कल्पियले असे, व्हावे समाधान,
गरजेला अशा अंत नसे !

कर्मासाठी उभा जन्म कमी पडे,
तरी त्यागवृत्ती सापडेना !
ऐसपैस झाली सुखाची साधने,
त्याशिवाय आता राहवेना !

उगाच पसारा मांडियेला जगी,
 कशासाठी तूही धावतसे!
जोडले तुम्हास विश्वाशी कशाला,
एक प्रश्न मनी राही सदा !

एकाचे जे सुख, ते दुःख दुसऱ्याचे,
असे कसे हित स्वीकारावे !
सुख समाधान असावे समान,
असावे जगाशी एकरूप !

दुसऱ्याच्या ठाई माझेपण गेले,
काही न स्वतःचे स्वतःपाशी !
देह हे साधन, साध्य शोधण्यास,
अति त्याचे लाड करू नये!

बचपन

ले सर - सर हाथ में डोर पतंग की, हम भी दौड़ा करते थे,
ना धूप का डर ना छांव की आशा निर्भय खेला करते थे।

मार पीट भी एक खेल था, जब का तब हिसाब बराबर,
पीटे पिटाये सब मिलजुल कर एक थाली में चरते थे ।

तेरा मेरा हर बात में मसला, रोज की कीच कीच होती थी,
मिट्टी के बर्तन, सायकिल की चक्कर बारी - बारी मिलते थे ।

लुका छूपी, चोर पुलिस, कैरम, चेस और साप सीढ़ी,
इन सबके लिए था समय बहोत, मुश्किल से पढ़ते लिखते थे ।

नदियां, जंगल, कुंआ, नेहर इन सब से अपनी यारी थी,
भंवरा, तितली, चिड़िया, बुलबुल, खेल में साथ ही रहते थे।

अब भी सब कुछ मिल सकता हैं , नज़रिया ज़रा बदलना है,
ये निर्भर सब है सोच पर अपनी बूढ़े बाबा कहते थे।

प्रमाण

विरूद्ध ही प्रमाण है समानता का,
इसी से लेता हैं जन्म विरोधाभास,
यहीं हैं ज्ञान और अज्ञान के बीच का अहंकार,
इसी में है अंधकार और उजालों की तुलना का उगम,
इसी से होती हैं मन में विचारो की उत्पत्ति,
इसी से बंधते है होने और ना होने के कयास,
संभव और असंभव के इस चक्रकाल में
धसते जाते हैं कई सत्य - असत्य के आयाम,
प्रकाश की अनुपस्थिति जन्म देती है अंधकार को,
और अंधकार का नहीं होता कोई अस्तित्व,
सत्य - असत्य, पाप - पुण्य, अच्छा - बुरा, दानव - मानव,
सब एक दूसरे पर निर्भर, निरंतर, नितांत ।
विरूद्ध ही प्रमाण है समानता का ..!

तुम्हारी मर्ज़ी

घर में रहो या बाहर, तुम्हारी मर्ज़ी
मौत चुनों या जीवन, तुम्हारी मर्ज़ी।

हर बात का मतलब उल्टा निकालो,
सीधी बात ना समझो कभी, तुम्हारी मर्ज़ी ।

घर में तुम्हारे और भी है चाहनेवाले,
उनके बारे में भी सोचो, तुम्हारी मर्ज़ी ।

पूर्ण विराम से बेहतर हैं अल्प विराम,
जो भी करना उचित समझो, तुम्हारी मर्ज़ी।

जीवन क्षणिक, करना क्या है काया का?
पर ऐसी मौत मरना चाहो, तुम्हारी मर्ज़ी ।


सब पर्सनली मत लिया करो

सहज सरल जीवन हैं इसको बड़े मज़े से जिया करो,
एक बात ध्यान रखो, सब पर्सनली मत लिया करो।

हो गई थाली, बजादी घंटी, दिया बाती भी कर ही ली,
भला बुरा ना ढूंढो इसमें, जो मन करे सो किया करो।

सब अपनी बात पे अड़े रहे तो इस से हानी होनी हैं,
जो सबके हित में रहे बराबर उसका साथ दिया करो।

जात, धर्म और राजनीति का माना तुम एक हिस्सा हो,
बातों के चक्कर में ना आओ, इसे अपने मन से जिया करो,

देखो मेरी बात में अब दूजा मतलब ना कोई ढूंढ़ो तुम,
एक बात ध्यान रखो, सब पर्सनली मत लिया करो।

गंगा

गंगा का हर रूप सुहाना मन को लुभाता जाएं
जिसकी पावन जलधारा में जीवन बहता जाएं।

हो भागीरथी या अलकनंदा इसके नाम अनेक
हर "प्रयाग " में रूप नया, हर रंग उभरता जाएं।

हिमालय से हो विदा, गंगासागर तट तक आये,
हर एक छोटी बड़ी नेहर इसमें समाती जाएं।

कितना पावन अमृत जल हैं इसके कई उपाय,
बूंद बूंद से सृष्टि सारी तृप्त - तृप्त हो जाएं !

इसकी अद्भुत ख़ुशबू से परिसर पावन होता है
इसके केवल स्पर्श से , धरा देवभूमि कहलाए ।

ऋषिमुनी की तपोभूमि है इसका घर आंगन
ये देती हैं सबको सहारा, गंगा मैया कहलाए

मिलो कभी जो इस धारा से, इसकी ख़ुशबू लेना तुम
इसको गले लगाने से एक पर्व पूर्ण हो जाए । 

आशावाद

हर विपदा का एक ही हल, हो मन में आशाभाव,
फिर ना कोई छू पाएगा तुमको दुर्बल भाव।

अनित्य हर पल, अनित्य हलचल, अनित्य है संसार
देख निरंतर नहीं ठहरती  एक किनारे नाव ।
चलते रहना इस सृष्टि का हैं यही तो एक स्वभाव
हर विपदा का एक ही हल, हो मन में आशाभाव,

अतीत में झाकों तो जानो है अनुभव अपरंपार
एक बात तो समझ ही आए ना धूप रही ना छाव।
फिर क्यों सोचे आगे क्या हो चल शक्तिरूप समान
हर विपदा का एक ही हल, हो मन में आशाभाव।

अपने मन में बात पक्की जो सबके हित की ठानी हो,
अपना कोई ना स्वार्थ रखो तो रहेगा सबसे लगाव।
स्वहित में ही सबका हित है यही हो अपना पुराने
हर विपदा का एक ही हल, हो मन में आशाभाव

फिर ना कोई छू पाएगा तुमको दुर्बल भाव
बस मन में आशाभाव, हो मन में आशाभाव ।


कोई नज़्म नहीं आयी

कोई नज़्म नहीं आयी

आज पूरा दिन रिक्त, सूना-सूना था
मद्धिम हुई थी शाम तो सूरज भुना-भुना था,
फिर अंगड़ाई लेकर संध्या धीमे - धीमे रात हुई
ना जानें फिर भी आज ज़ेहन में कोई नज़्म नहीं आयी ।

ना कहीं  जाना हुआ ना किसी से बात हुई
दो - चार किताबें, कुछ ग़ज़लें इनकी पूरी साथ रही,
साज़ छेड़ा कुछ पल भर तो सूर में भी हरकत पाई
ना जानें फिर भी आज ज़ेहन में कोई नज़्म नहीं आयी ।

तस्वीरों का गट्ठा खोला बचपन से भी मिल आए
एक कहानी टीव्ही पर भी बचपन की यादें जी आए,
इस करवट से उस करवट बस बैचेनी ही है पाई
ना जानें फिर भी आज ज़ेहन में कोई नज़्म नहीं आयी ।

समय का पहिया धीरे धीरे, आगे-आगे बढ़ता है
अतीत और भविष्य हमेशा वर्तमान से लढ़ता है,
क्या मिटाएं क्या बनाएं बात समझ में नहीं आयी
ना जानें फिर भी आज ज़ेहन में कोई नज़्म नहीं आयी ।


आंखों देखी

आंखों देखी, कानों सुनी कुछ नहीं होती
अनुभव की वो सारी बातें सच नहीं होती,

ज़िंदा रहने की कोशिश में उलझे अगर हो
मौत की आहट कहो तो दिल में अब नहीं होती,

कुदरत से सीखा हों जिसने देने का धर्म
उसके लिए ख़ुद की ज़रूरत सब नहीं होती,

 वैसे तो ज़रूरत की देखो  बात ही अलग हैं
कितना भी मिले मगर तबियत ख़ुश नहीं होती,

घना कोहरा, बिखरे गेसू, मध्यम सांसे
एक मौसम की वो शरारत अब नहीं होती,

और सुनाओ हाल तुम्हारा अब कैसा है
दिल बहलाने की कोई करामत अब नहीं होती?

Sunday, January 20, 2019

क्या है?

अच्छा क्या है? बुरा क्या है?
इस बात से किसी को मिला क्या है?

इस ख़याल की रुह में ग़म पलता है,
तेरा क्या है? और मेरा क्या है?

तुम्हारे माथे को चूम लूँ, करीब आओ
इस से बढ़कर दुनिया में सुनहरा क्या है?

मोहब्बत तो मोहब्बत होती है,
बेहद क्या है? ज़रा क्या है?

एक बार जो बन गए आशिक तो,
फिर जिया क्या है? और मरा क्या है?

वक़्त से पूछो वक़्त का मिज़ाज
पूरा क्या है? अधूरा क्या है?







Wednesday, November 21, 2018

ज़रा संभल कर

ये खुद़ा का एहसान हैं, ज़रा संभल कर
मोहब्बत का इम्तिहान है, ज़रा संभल कर

ठान लिया है तो कर तुफान से जंग मगर
कच्चा तेरा मक़ान हैं, ज़रा संभल कर

बेचैनी रही बरसों तक लगा ना मन कही
गुज़रेंगे तेरे कुचे से अब, ज़रा संभल कर

रूह में उतरने का जो हुनर भी तुझमें है
इस बार लगाएंगे गले, ज़रा संभल कर

प्यार के भंवर में यूं जो रखा है कदम
डूबेंगे तेरे साथ सनम, ज़रा संभल कर

कुछ देता हैं तो बदले में कुछ छीन लेता है
मांगेगे ख़ुदा से तुझे हम, ज़रा संभल कर

मर जाये तो पुछेंगे

दर्द है, रूसवाई है, प्यार है
ये रिश्ता हमारा बेशुमार है

सुन जरा गौर से हाल-ए-दिल
एक ज़माने से तेरा इंतज़ार है

संभलकर खर्च हो लम्हे जिन्दगी
बेहिसाब सा ये कारोबार है

मर जाये तो पुछेंगे इत्मिनान से
अब ये नया कौनसा किरदार है

गैर ही सही, हमे कुछ तो समझा
तेरा नज़रे चुराना राज़दार है

ख़यालों से निकलकर कभी
देखों समय की क्या रफ़्तार है

अब फ़रिश्ते बने फिरते हैं वो
ग़ुनाह जिनके कई हज़ार है

फर्ज़ अदा करता हूँँ

ग़ज़ल ये तुमको मैं अता करता हूँँ
और क्या-क्या दे सकूँँ पता करता हूँँ

हर वक्त नहींं रहती मोहब्बत सीने में
कभी-कभी मैंं बस फर्ज़ अदा करता हूँँ

मैं, मेरी सच्चाई, मेरा वजूद और ये जहाँँ
जाने इन बातों मेंं क्यूँँ वक्त ज़ाया करता हूँँ

बह जाता हूँँ बहाव में समजदारी के अक्सर
बार-बार ना जाने क्यूँँ मैं यही ख़ता करता हूँँ

ग़ज़ल, संगीत, शायरी और दीदार तेरा
आज कल बस इन्ही बातो का नशा करता हूँँ

तुम करो दंगे फसाद, मोहल्ले जला दो
मैंं ख़ामोशी से अक्सर अमन बयान करता हूँँ

बरकरार रहे

जो भी है दरमियां बरकरार रहे
ज़रूरी नहीं है के सिर्फ प्यार रहे

अंगडाई लेने का हुनर और आह्ह
हुस्न ताउम्र तुम्हारा कर्ज़दार रहे

नहींं किया ज़िक्र ना इज़हार भी
यूँँही तेरी चाह के तलबगार रहे

चाँँद की रात हो या रात का हो चाँँद
आपस मे मिला जुला इख़्तियार रहे

तेरे आने के बाद जिन्दगी मेंं देखो
जितने भी पल मिले यादगार रहे


ग़म ज़माने के सहे मुस्कुराते हुए
ऐसे आस-पास मेरे अदाकार रहे

रहे मीर, ग़ालिब, फैज़ और जफ़र रहे
और घर में हमारे चारसू गुलज़ार रहे

तरह-तरह के लोग

तरह-तरह के लोग है भैया तरह-तरह के लोग
कोई खाये चोरी का तो कोई लगाए भोग
भैया तरह-तरह के लोग

जन-जन में डर की बाते यूं फैलाई जाती हैंं
समझ ना आये कहाँँसे ऐसी अफवाये आती हैंं
कोई कहे मंदीर बनेगा, कोई बंद करेगा नोट
भैया तरह-तरह के लोग

सारी बाते भूल गये तो याद दिलाई जाएगी
दुश्मनी की दास्तां बेबाक सुनाई जाएगी
फिर भी अगर रहे जिन्दा तो नसीब कहो या योग
भैया तरह-तरह के लोग

कितने सारे लोग यहा हैंं इन्सान कही खो गया
जो कुछ तुमने चाहा था अब वैसा ही हो गया
जब चुनाव ही तुम जीत गए तो क्या करे आयोग
भैया तरह-तरह के लोग

देखो हिन्दोस्तान की एक ऐसी अजब कहानी थी
राजा रंक हिन्दू मुस्लिम सबको मुह ज़बानी थी
धर्म से बढकर सत्ता हो गई ऐसा लग गया रोग
भैया तरह-तरह के लोग

सारे हो गये धनी यहाँँ पर सुख का कोई पता नही
जिस के पीछे भागे हर पल वो तो कभी मिला नही
दिल को बहलाने के लिए इसे कह दिया संजोग
भैया तरह-तरह के लोग

धडकने नहींं रही

तेवर अपने पास ही रखों जरा तुम
जिन्दगी का सुवाद भी चखो जरा तुम

लाएंगे तूफान से साहिल पे कश्तियाँँ
हम पर भी ऐतबार ये रखो जरा तुम

जो हो गई है आस-पास गर कम रौशनी
दिल-ए-चराग अपने साथ रखो जरा तुम

मेरे सनम मेरे नसीब मेरे हबीब हो अगर
तो हौसला भी बेशुमार रखो जरा तुम

धडकने नहींं रही दिल भी नहींं रहा
सीने पे मेरे हाथ तो रखो जरा तुम

रहो अगर चाहना नशे मेंं रात दिन
जिन्दगी भी साथ-साथ रखो जरा तुम

कली का भी फुल हो जाएगा एक दिन
भंवरा भी अपने बागान में रखो जरा तुम

कभी मिलती है

कभी मिलती है सजा तो कभी इनाम है
झूठ देख तेरा क्या-क्या अंजाम है

मिल जाए कभी जो बिती हूई घड़ियाँँ
समझ लो यह वक्त का एहसान है

संभल जाए तो कभी बिगड जाए
नियत का भी अपना एक ईमान है

तेरी यादों में नहींं आती निंद अक्सर हमे
चाँँद देखो वहाँँ खामखा परेशान है

हम उठाते रहे उंगलियाँँ एक दूजे पर
साफ-साफ, पाक सा किसका गिरेबान है?

एक नजर देखे

बेशक यूँही नही दिल किसी पर आता है
जिस पर जान मर मिटे उसी पर आता है

एक नजर देखे और मदहोश कर दे
ऐ ख़ुदा कहाँँ से इनको ये हुनर आता है

दूर तलक देखते रहे गुजरे जो मुसाफ़िर कोई
एक बार जो गुज़र जाए कहाँँ फिर आता है

जरा ध्यान से बरखुरदार तूफ़ान आनेवाला है
बुज़ुर्गोंं को न जाने ये कैसे नजर आता है

वहींं रहता है वो फरिश्ता आज भी
जहाँँ बर्गत का वो बुढा शजर आता है

जब मन चाहे

शाम को आँँगन में एक बात हुई
आज बचपन से मुलाक़ात हुई

फुल खिले घर में बागान हुआ
कलियों की आँँगन मेंं बारात हुई

लाख निहारो तुम आसमान को मगर
जब उसने चाहा तब ही बरसात हुई

जब मन चाहे के सहर ही ना हो
फिर ना दोबारा कोई वैसी रात हुई

इस रिश्ते पर टिकी है जिन्दगी मेरी
मुक्कमल हर अपनी मुलाक़ात हुई

अनसुने किस्से

जितने अनगिनत हिस्से इस जहाँ में हैं
उतने अनसुने किस्से इस जहाँ में हैं

हो जाए दिल अगर बेईमान तो क्या हो
क्या हम अकेले ही अच्छे इस जहाँ में हैं?

ए शहंशाहो बंद करो मासुमों पर सियासत
कितने प्यारे, बेगुनाह बच्चे इस जहाँ में हैं

शाम होगी रात ढलेगी फिरसे सूरज निकलेगा
फिर क्या है, बस देखो तो यादें इस जहाँ में हैं

ना जिक्र हुआ, ना तेरी कभी याद आई
आधे-अधूरे बने-बनाए वादे इस जहाँ में हैं

हमें क्या है, वक्त हम से मांगेगा एक दिन हिसाब
मेरी किताब के सारे पन्ने खुले इस जहाँ में हैं

कुछ पल

मेरे भाव खो गए हैं कही
अब मुझे रोना नहीं आता ।
छोटी-छोटी खुशियों से
आँखे जो छलक जाती थी
अब वो निर्जल है, तृष्णा से भरी,
क्रोध से अस्वस्थ,
लालसा, वासना से धुंधली !

कुछ पल थे
जिन का स्मरण हो तो आँखे भर आती थी...
फूट-फूट के रोया करती थी...
चित्त-मन आक्रोश करता था
देर तक बहोत देर तक,
अब तो बस सिर्फ अफ़सोस रहता है खोकला, बेजान..!
मन रिक्त हो जाता ..!
नया पन आ जाता था
आँखों से मुक्त होकर बहते भावों से...!!!
कभी बड़ो के संग बड़ा हो जाते
तो कभी बच्चो संग बावले
बडे निर्मल थे वो भाव..!!
पाने-खोने, मुनाफे के
हिसाब से बढ़कर
थे वो भाव..!
स्वाभिमान और सम्मान से
बढ़कर थे जो भाव
मेरे ख़ुद से कई गहरे,
ऊँचे थे वो भाव..!
मेरे भाव खो गए हैं कही
अब मुझे रोना नहीं आता ।

होना था वो ना हुआ

माहताब बने फिरते है, आफताब मेरी इस दुनिया में
हम भी तो बदलते रहते है किरदार गजब के दुनिया में

खेल-खेल में सिख लिए है रस्मो रीवाज मोहब्बत के
खेल कोई ऐसा ना बना जो वफ़ा सिखाए दुनिया में

मेरी अपनी ख्वाहिश थी के तेरा असली रूप दिखे
मंदिर, मस्जिद गिरिजाघर के चक्कर काटे दुनिया में

होना था वो ना हुआ जो ना होना था हो गया
एक ही बात बार बार दोहराते है सब दुनिया में

तेरा मेरा झगडा तो बस एक छोटी सी बात का था
कैसी-कैसी बातों पर देखो लोग झगडते है दुनिया में

ये करलू तो मन भर जाए, वो हो तो जीवन हो सफल
कितनी सारी ख्वाहिशों मेंं जान फसींं है दुनिया में

तुम आए हो खैर मनाओ, हम आए तो बात है क्या
कैसे कैसै अजब गजब के लोग पडे है दुनिया में

मेरे भीतर तेरे भीतर ना प्यार है ना नफरत है
सब दुनिया की बाते है जो हमने सीखी दुनिया में

भला-भला तो सब चाहे, चाहे कभी ना सबका भला
भले-बुरे की तरकीबें भी खूब मिली है दुनिया में

बुध्द ना समझे, कृष्ण ना समझे ना जाने महावीर को
ऐसे वैसे लोग तपस्वी बने फिरते है दुनिया में

चाहते हैंं

जिन्दगी मुक्कमल सी जीना चाहते हैंं
वो ग़म मेंं भी मुस्कुराना चाहते हैंं

एक साँँस, जान, हुनर और नसीब
एक पल में क्या-क्या आज़माना चाहते हैंं

इनको समझाओ जात और धर्म
कम्बख़्त अमन से जीना चाहते हैंं

कोई रोये, कोई तबाह हो, मर जाए
कुछ लोग इस मेंं भी सियासत चाहते हैंं

तेरे साथ गुज़रे हर लम्हें की कसम
हम फिरसे उन्हे जीना चाहते हैंं

मेरे सामने कुछ कहे पीछे बोले कुछ
लोग ऐसे भी हमसे वफ़ा चाहते हैंं

किसी दौर के होते नही मुसाफ़िर
ये वक़्त के साथ ही चलना चाहते हैं

जहाँँ लिखा होता है मौन बनाए रखे
कई हैंं जो सिर्फ वही बोलना चाहते हैं

तेरा इंतज़ार है

दर्द है, रूसवाई है, प्यार है
ये रिश्ता हमारा बेशुमार है

सुन जरा गौर से हाल-ए-दिल
एक ज़माने से तेरा इंतज़ार है

संभलकर खर्च हो लम्हे जिन्दगी
बेहिसाब सा ये कारोबार है

मर जाये तो पुछेंगे इत्मिनान से
अब ये नया कौनसा किरदार है

गैर ही सही, हमे कुछ तो समझा
तेरा नज़रे चुराना राज़दार है

ख़यालों से निकलकर कभी
देखों समय की क्या रफ़्तार है

अब फ़रिश्ते बने फिरते हैं वो
ग़ुनाह जिनके कई हज़ार है

ज़रा संभल कर

ये खुद़ा का एहसान हैं, ज़रा संभल कर
मोहब्बत का इम्तिहान है, ज़रा संभल कर

ठान लिया है तो कर तुफान से जंग मगर
कच्चा तेरा मक़ान हैं, ज़रा संभल कर

बेचैनी रही बरसों तक लगा ना मन कही
गुज़रेंगे तेरे कुचे से अब, ज़रा संभल कर

रूह में उतरने का जो हुनर भी तुझमें है
इस बार लगाएंगे गले, ज़रा संभल कर

प्यार के भंवर में यूं जो रखा है कदम
 डूबेंगे तेरे साथ सनम, ज़रा संभल कर

कुछ देता हैं तो बदले में कुछ छीन लेता है
मांगेगे ख़ुदा से तुझे हम, ज़रा संभल कर

करते है

सोच समझकर नाप-तोलकर याद हमेंं वो करते है
हौले-हौले, धीमे-धीमे बरबाद हमेंं वो करते है

परदे में पलकों को झुकाए वो गुज़रे जो करीब़ से
थरथराते रंगीन लबों से आदाब हमेंं वो करते है

दूर से दिदार करे फिर चुपके से पास आए
एक बार अगर फिर छू ले तो पाक हमेंं वो करते है

पहले तो पैरो तले कुचलते है, मसलते है
फिर जब दिल भर जाए तो ताज हमेंं वो करते है

जब कभी मिलते है वो तनहाई में छुप छुपकर
पहले तो तरसाते है, फिर आबाद हमेंं वो करते है

ज़माने में

कैसा दौर-ए-ख़ैरियत चलने लगा है ज़माने में
घर किसी और का जलने लगा है ज़माने में

अच्छा हुआ जो इस बार बच निकले सनम
ग़म किसी और को मिलने लगा है ज़माने में

ज़मीर, मक़ान, मुल्क और ख्व़ाबो-ख्व़ाहिशे
देखो क्या-क्या खुले आम बिकने लगा है ज़माने में

जो सच्चा था, नीड़र था सिधी बात रखता था
वो आईना मजबूरन बिख़रने लगा है ज़माने में

एक दौर था जब भाईचारा इस मुल्क की शोहरत थी
इस दौर को क्या हुआ जो रूकने लगा है ज़माने में

नसीब़ तो निखरेगा एक दिन, तेरा क्या मेरा क्या
तू क्यों बीच राह यूँँ रूकने लगा है ज़माने में

आओ अब के किसी और जहाँँ में ले चलो हमें
क्या करे, अब ये दिल मचलने लगा है ज़माने में

काही केल्या जात नाही

काही केल्या जात नाही
गती कर्माची ती राही,

होई शांत-स्थीर-चित्त
मना सांग असे काही,

कुणा वाटेना मरावे
वाट जगण्याची पाही,

मन लागे माझ्याविना
अशी देशील का ग्वाही,

आली समीप जर का
सांग गुपीतही काही,

असे किनारा निवांत
खळखळून नदी वाही,

त्याच्या बासरीला भुले
राधा एकटीच नाही,

दिस सरला खोप्यात
वाट आईची ती पाही.

ज़रूर

मुअय्यन है मुलाक़ात तो होगी ज़रूर
तेरे भी दिल में आस ये रहेगी ज़रूर

गुज़रे है कूचे से तेरे हम बार-बार
नक़्शे पा निशानियाँँ होगी ज़रूर

हम नहीं, ना सही क्यूँँ रंजिशे बेजा
महफ़ील में तेरी बरतरी होगी ज़रूर

मजाज़ लग रहा है दुनिया में होना यूँँ
उसको भी तो बेचैनियाँँ होगी ज़रूर

जो कह रहे बात तो सुन भी लो फ़कीर
तुम को भी चाह-ए-रस्म होगी ज़रूर

सियासतों ने मुल्क को

अय्याब मेरे दिल का मैं अगर रहूँँ
तो भला बात तेरे मन सी क्यूँँ कहूँँ

रह कऱीब दूर से ना दे दगा मुझे
मैंं भी तेरी अय्यारी से हो जाऊँँ रूबरू

सियासतों ने मुल्क को मुल्क ना रखा
मुहसीन सा ये रवैय्या मैं कब तलक सहूँँ

तुम झूठ का हुनर मुझे दे दो ज़रा ज़रा
मैं भी तो इसमेंं आपसी महारत हासिल करूँँ

मिल जाये कहींं मुझको जो पैराया-ए-हकीम
मैं भी तो ग़मकदा का फिर इलाज़ तो करूँँ

है चाँँद तेरे पास तो ग़म क्या है आसमाँँ
मैं भी तो मेरे चांद का आसमाँँ बनू

रूठकर आईना शीशा हो गया,

बेहतर नहीं होती है सिर्फ़ सोचकर,
ज़िंंदगी को कर हसीन तू तराशकर

वो नफ़ीसा, बदनिसीबी और तेवर,
खरीदे नहीं जाते गहने, ज़ेवर बेचकर

रूठकर आईना शीशा हो गया,
लाए थे बाज़ार से सोच समझकर

हो मन्नते पुरी कभी तो लौट जाऊंगा,
निकले थे घर से हम भी यह बात ठानकर

ग़म के निशां कहकशा राते मदभरी,
चलना नहीं सिखा कभी होश संभलकर

मन लगे दुनिया में तो कुछ गाले-झूमले,
मिलते नहीं हसीन पल एकबार गुज़रकर

गर मिल गया, मिला नहींं तो क्या हुवा भला,
गिनता नहीं है साँँस कोई एहसान समझकर

सुनी-अनसुनी आहटें

आजा के अब फिर वही शाम आयी
अनहद अंधेरे में लिपटी गुमनाम आयी

कोई करे सज़दा कोई गुनाह करे
इरादों से भरपूर यूं बदनाम आयी

सुनी-अनसुनी आहटें होती है
तेरी यादे कहीं पर तो काम आयी,

जो देर रात तक़ता रहे चाँद को
सुबह उसके दर पे ले अंज़ाम आयी,

वादे,दावे कर कर के जो थक चुका
बेवफ़ाई उसके सिर पर इल्ज़ाम लायी,

चलो हुआ जो हश्र अच्छा था
दुनिया की जो तोहमते तमाम आयी,

तेरे दर से गुज़रे तो जी को सुकून मिला
मोहब्बत बरसों बाद कोई ईनाम लायी

Friday, September 7, 2018

मंगलम्

मंगलम् झूठा भला
मंगलम् सच्चा बुरा
मंगलम् मतलब भरा
मंगलम् 'मैं' ही बड़ा

मंगलम् करनी करम
मंगलम् कैसा जनम
मंगलम् से हो अहम
मंगलम् अंधा धरम

मंगलम् मृत्यू समीप
मंगलम् सब मोहनम्
मंगलम् भोगे सभी 
मंगलम् नित्यों नियम


मंगलम् मेरा नसीब
मंगलम् मेरा करम
मंगलम् माया सभी
मंगलम् मन जीतनम्

मंगलम् सब प्रेममय
मंगलम् काहे का भय
मंगलम् गर हो भरम्
मंगलम् साक्षी की जय

Wednesday, April 11, 2018

दोहे

सुख की चिंता सब करे
सुखी ना कोई होए,
सुख बैठा अंतर्मन में
दर्शन कैसे होए।

बात बात पर लड़ पडे
मानव है या श्वान,
झूठी तेरी शौकत है
और झूठी तेरी शान।

मन मंदिर तो कह दिया
पर भीतर अंधःकार,
चेतना को लज्जीत करे
लालच लोभ महान।

कथनी तो कथनी भई
करनी कभी ना होए,
भोग में जीवन बिते
तृप्त कभी ना होए।

बैठे बैठे सब चाही
कर्म करे ना प्रयास,
समय चले अपनी गति
मन में केवल आस।

संयम से ही सब मिले
संयम कहाँँ से लाए,
संयम संयम रटते रटते
अति अधीर हो जाए।

मीरा जाने प्रेम को
ना प्यासी ना उदास,
प्रेम ऐसी प्रीत है
सदा हरि के पास।


Tuesday, April 10, 2018

दुविधा

किसने सोचा था,
संसार इतना गहन होगा?
जीवनभर उद्धार हो जिसका,
उसका अंत में पतन होगा?
नर, नारी, ज्ञानी, गुनीजन
सबकी एक दुविधा थी,
जीवन भर जतन क्या करना
जो यज्ञजीवन कि समिधा थी?
ऐसे सारे सवाल जो बिते
समय चक्र के काल में,
कहो युगंधर क्या
यह है जीवन
क्षण-क्षण के
संहार में?
पल जो आए चलता जाए
अनंत तृष्णा - चाह में?
उपदेश तुम्हारे
ऐसे जाने आदेश
समझ स्विकार करे?
पार्थ कहो
फिर क्या मृत्यू से
उठकर मोक्ष प्राप्त करे?
सब ने अपने कर्म किये
पर फल तो सभी का एक था?
मृत्यू ही तो पाई अंत में,
फिर जीवन भर थी दुविधा क्या?


Saturday, April 7, 2018

ख्व़ाब



सुबह होते ही रोजगार पर निकल पडते हैं
जरूरतों की आड़ में ना जाने कितने ख्व़ाब मरते हैं,

नन्ही सी आखों को गौर से देखना कभी
फ़रिश्तों की दुनिया के जिनमें ख्व़ाब पलते हैंं,

मेरी बाते फिज़ूल है इनपर तुम ना गौर करो
शक्स कोई ढूंढो ऐसा, जिससे ख़याल मिलते है,

वक्त मिले फुरसत का तो सोचना ज़रूर
हम किससे और किस-किस बात पर लड़ते हैंं,

शुक्रिया शब-ए-रहमत मुक्कमल दिन गुजरा
ख्वाबो का वक्त हो गया, अब सुबह मिलते हैंं..!

Friday, April 6, 2018

दायरा


सलामती के दायरे से निकलोंं कभी
तुम अपने "आप" से निकलोंं कभी,

हो सके तो चाँद भी आएगा ज़मीं पर
तुम खुले आसमाँँ में निकलों कभी,

जल गये तो राख़ भी हो जाए यक़ीनन
चिनगारी बन धुंए में से निकलोंं कभी

वो यारीयाँँ-विरानियाँँ मेरेही किस्से हैं
गर तुम मेरे यार से निकलोंं कभी

एक घाव जो भर गया वक्त़ के साथ
लेकर हिसाब़ ईलाज का निकलोंं कभी

मैने जो मान लिया सच हो गया
झूठ है तो, झूठ भी निकलोंं कभी

सफ़र हमसफ़र तय होते नहीं यहाँँ
ये फ़रिश्तों की देन हैं तुम निकलोंं कभी

पानी का बहाव है बह ना जाना कहीं
ये दुनिया मायाजाल है निकलोंं कभी

सियासत की बेईमानी साबित करो
बन कारवां-ए-इन्कलाब निकलोंं कभी


नज़रियाँँ


जी बहलाने का कोई ज़रिया ढूँँढोंं तुम
डूब जाने को कोई दरिया ढूँँढोंं तुम

जात-पात धर्म-पंथ, बस भी करो
इनसे परे भी कोई नज़रियाँँ ढूँँढोंं तुम

क्या कोई अपनाए और कोई ठुकराए
ख़ुद को जो भाये ऐसा रवैय्या ढूँँढोंं तुम

स्नेह में लिपटी चाह से भरपूर हो
मन से मन की कोई डगरियाँँ ढूँँढोंं तुम

बेईमान हो गये हो दुनिया की नज़रो में तो
बेईमानों से अलग कोई दुनिया ढूंढो तुम

जिस्म की आग अगर बुझ गई हो तो
मन के लिए भी कोई गवैया ढूँँढोंं तुम

एक था राज्य, राजा जिसका आदर्श था
आज-कल ना ऐसी कहानियाँँ ढूँँढोंं तुम


Wednesday, April 4, 2018

प्यार क्या हैं?

प्यार! 
एक ऐसी पहेली है, जो सदियों से लोगों के दिलो-दिमाग पर राज कर रही हैं. क्या कोई जानता भी है के 'प्यार किसे कहते हैं'? ऐसा क्या हो जाता है जब हमें लगता हैं के हां हमें प्यार हैं. एक दूसरे के ख़यालों मे दिन रात डूबे रहना प्यार है? किसी अज़ीज के ख्व़ाब पूरे करने के लिए निस्वार्थ जीवन समर्पित कर देना प्यार हैं? प्यार त्याग है या भोग है? प्यार मोह है या चाह? प्यार प्यास है या तृप्ति? 
यक़िन मानिए प्यार किसी एक बात या विचार से समझाने वाली चीज नहीं है. ये वो एहसास है जो अगर एक बार हो जाए तो जन्म-जन्मांतर तक इसकी अनगिनत स्मृतियां हमारे तन मन को प्रसन्न एवम् सुगंधित रखती है. प्यार एक ऐसी छुअन है जो हमारे पाँचों इंद्रियों से नहीं बल्कि आत्मा से अवगत होती हैं. हम जिसे प्यार करते हैं या जिससे स्नेह हो जाता है, ऐसे व्यक्ति का स्थान हमारे जीवन में सदा के लिए उच्च हो जाता हैं और इस बात का हमें ना गर्व होता हैं ना अभिमान. प्यार ऐसे कई अनामिक धागों से बुना हुआ एक रेशम का कालिन है जो समय आने पर हमें कांटों से बचाने के लिए हमारे पाँँव के निचे समर्पित हो जाता हैं, तो कभी हमारा सम्मान बनकर हमारे सर का ताज बन जाता हैं. कभी हमें अपने अस्तित्व का एहसास दिलाता हैं तो कभी अहम से हम बना देता हैं. हम प्यार को किसी एक परिभाषा में नहीं बाँँध सकते, इसीलिए कई विशेषणों का आधार लेकर इसको समझने का प्रयास करते हैं. फिर वही प्रश्न बार बार सामने आता है कि क्या प्यार को किसी भी माध्यम से समझा जा सकता हैं? तो उत्तर मिलता है, नहीं. प्यार को किसी में देखा जा सकता है, किसी द्वारा सुना जा सकता हैं पर समझा नहीं जा सकता क्योंकि इसको समझने के लिए इसकी गहराई में ऊतर कर ऊँचाई तक पहुँचना पडता है. ऐसी कौनसी चीज है जो हमें प्यार से रूबरू कराती हैं? एक बात ये है के हम दो होकर एक से हो जाते हैं. हमारा सुख-दुख, लाभ-हानी,
मिलन-जुदाई, इन सबसे आगे निकल जाते हैं. प्यार हमें हर उस चीज से मुक्ति दिलाता हैं जो बंधन हो. प्यार हमें किसी का गुलाम नहीं बनाता बल्कि हमें अपना ही स्वामी बनने कि क्षमता हमें प्यार देता हैं. विचारोंसे मुक्त होकर जब आपका अन्तरमन प्रसन्नता की लहरो पर विहार करता हैं वो प्यार है. प्यार संशय नहीं बल्कि दृढ़ विश्वास है. प्यार मालकियत नहीं स्वतंत्रता हैं. जब हम किसी व्यक्ति में प्यार खोजने की चेष्टा करते है तो केवल असफलता और निराशाही हाथ लगती हैं क्योंकि प्यार की खोजही प्यार की सबसे बडी विडंबना है. प्यार खोने जैसी चीज नहीं है ना ही पाने जैसी. अंधकार में बावजूद रौशनी की तरह होता है प्यार. एक रौशनी जो तन मन उजागर कर दे. दोस्तों प्यार पर किसी का काबू नहीं होता इसे गौर से समझा जाता है. ये एक ऐसी अनुभूति है जिसका एहसास हमें हर सोच हर विचार से मुक्त कर देता है और सिर्फ प्यार की तरंगें ही हमारे संपूर्ण शरीर दर- भीतर लहराती रेहती हैं. क्या आपको कभी प्यार में धोखा हुआ हैं? क्या आपको कभी प्यार में दर्द मिला हैं? क्या आपको कभी किसी की जुदाई में तकलीफ का सामना करना पडा हैं? तो यकिन मानिए ये प्यार नहीं बल्कि कुछ और हैं. ये केवल मात्र आकर्षण हो सकता हैं या फिर किसी से कुछ पाने की अपेक्षा. और जहां कुछ मिलने की या पाने की अपेक्षा हो वो प्यार नहीं कुछ और हैं. प्यार में ना कुछ पाना होता हैं ना कुछ खोना. प्यार में तो बस हम यात्री हैं जो हमें अपने आप स्वयंपूर्ण, परिपूर्ण होने का एहसास दिलाता हैं. कुछ मिल जाये तो समझो प्यार नहीं, कुछ खो जाये तो समझो प्यार नहीं. प्यार का संबंध ना मिलन से हैं ना जुदाई से, ना जीवन से है ना मृत्यु से. प्यार इन सब से बढकर हैं. आपकी चेतना को जो छू जाये, आपके विचार गमन मे जो प्रवाहित हो वो प्यार हैं. सांस की हर लहर को जिस से एक लयबद्धता प्राप्त हो वो प्यार हैं. सांस एक पल के लिए थम जाए और हमें अद्भुत अद्वितीय क्षण की अनुभूति प्यार हैं. हर पल किसी का इंतजार प्यार नहीं बल्कि किसी के हमारे आसपास ना होना भी प्यार हैं. किसी हमसफर के साथ जिंदगी भर साथ निभाने के सपनों में खो जाना प्यार नहीं हैं बल्कि ऐसे व्यक्ति का एहसास हमें मिला इस सदविचार में प्रसन्नता से जीवन का व्यतीत हो जाना प्यार हैं. प्यार मुक्ति है, निश्चिंतता हैं, जीवन के आसमाँँ में निडर होकर गोता लगानाही प्यार हैं. प्यार में किसी प्रकार का करार या कटिबद्धता नहीं होती, प्यार संसार के हर बंधन से मुक्त होता है और मुक्त कर देता है. 
प्यार किया नहीं जाता प्यार को जिया जाता है.

शिष्टाचार


एक लड़का लड़की मिल बैठे 
जो ना करनी थी, कर बैठे 

ऐसी भी क्या बात हुई 
आख़िर तुम मिले ही क्यों?
जो मान सके ना समाज 
फूल ऐसे खिले ही क्यों?

फिर देखो हाहाकार हुआ 
लोगों के मन में विकार हुआ 
कोई कहे दफना दो 
कोई कहे जला दो

जब युक्तिवाद ही करना था 
तब गोत्र सबको सुनना था 
ये तुमने कैसा पाप किया 
कुल को क्यों बदनाम किया? 

सबको जाने क्या खलती थी 
वो बात दिल से निकलती थी 
ये वध है अपनी प्रतिष्ठा का
सम्मान का, संस्कार का  

जाने किस संस्कार की बातें ?
लोग कर रहे अधिकार की बातें 
मिल लिए जिनको मिलना था 
नही संभले जब संभलना था 

हर किसी रिश्ते के पहले
वे दोनों नर और नारी थे 
अपने अपने जीवन के 
वे स्वयं अधिकारी थे  

अब बात जो संस्कारों की 
समाज के अधिकारों की 
तो उत्तर भी एक दे देना 
जब पंछी पिंजरे में बंधे 
क्या भूल जाता है वो उड़ना? 

कितने रीति-रिवाजों को 
हमने बनाया मिटाया क्यों?
लोगों के जीने मरने पर 
हमने अधिकार जताया क्यों?

हर रिश्ते को रखो सामने 
एक बात ज़रा तुम पूछो तो? 
क्यों रहते हैं हम साथ निरंतर 
क्या है पहेली बूझो तो?

खेल सारा ज़रूरतों का 
ना समझा कोई ना मानेगा 
जो कहे बात ऐसी 
वो दंड समाज से पाएगा

कर देंगे अपमानित उसको 
जो चौखट को पार करे
क्या होगा समाज इस से 
अनुकूल पात्र सबके लिए?

नर-नारी का संदर्भ लेकर 
बात शुरू करनी थी 
हर रिवाज को परखो समझो 
बस बात यही तो रखनी थी 

क्यों कहते हैं हम लोगों से 
तुम नैतिकता के ध्यानी हो 
नहीं करे जो मान्य तुम्हारी 
वो तो निर्बुद्ध अज्ञानी हो 

हर रिश्ते में ख़ुद को देखो 
फिर देखो तुम रिश्ते को 
जीवन सहज-सरल हो जाये 
ऐसे रखो निर्बंधो को 

अगली बार तुम ये करना 
जब कहीं भी निर्बंध हो 
अनुकूलता को समझो उसकी 
जो इसका आश्वासित हो 

बचा कुछ जो शिष्टाचार है 
उसको अब ना लज्जित करो 
जिसको जैसे भाता है 
वैसा जीवन व्यतीत करो...


Tuesday, April 3, 2018

हसरतें



यूं हसरतों में जीतें है और हसरतों पे मरते हैं,
जो लोग कुछ नही करते, वो यार कमाल करते हैं।

सारा गुस्सा, सारी अकड, और बातें बड़ी-बड़ी,
मर जाने पर लोग ना जाने किसके साथ जलते हैं।

खैर मनाओ जीवन बिता खुशियों और खुशहाली में,
लोगों की तो बात और है, ना जिते हैं ना मरते हैं।

ग़म के मारे, शाम हुई तो मधुशाला मेंं जा बैठे,
सारी सारी रात नशें में बाते होश की करते हैं।

बांध लिया है, रिश्तोंंसे जाल ऐसा बुना हैंं,
कंधा तो अपना है पर बोझ किसी का ढोते है।

ज्ञानी-पंडीत, मूरख-मानव सबका अपना जीवन हैं,
लोगोंं की बातों से वो ना जीते हैं ना मरते हैं।

डर-डरके, देखो, धिरे-धिरे हौसला तो करते हैं,
दुनियावालें बेईमानी को दुनियादारी कहते हैं।

चाहत, प्यार, मोहब्बत की तो बातही कुछ और है,
सफर करो जो तय अपना तो लोग सुहाने मिलते हैं।


Monday, April 2, 2018

नहीं लगता


दश्त-ए-दरख्तों में नहीं लगता
ये दिल अब परबतों में नहीं लगता।

तसल्ली मिले, जिंदगी मुक़म्मल हो,
दम ऐसा अब हसरतों में नहीं लगता।

कभी अमावस तो कभी पूनम की रात,
कुछभी नयापन इन करवटों में नहीं लगता... !

Sunday, April 1, 2018

मोड

गर उस तरफ मुड़कर देखो कभी,
तो काफ़ी धुंधला-धुंधला सा नज़र आता है सब …
ऐसा लगता है कि जैसे
भाप जम गई हो.
कुछ है तो सही, पर…
साफ़ साफ़ नज़र नहीं आता.
ये अतीत भी भला कैसा अजीब है न!
बस अभी गुज़रा,
अभी धुंधला सा हो गया...
तुम्हें तो सब कुछ
साफ़ साफ़ नज़र आता होगा!…
नहीं?

Monday, April 3, 2017

मंज़र

हर किसी को चाहने से तुम बदल सकते नहीं
बात इतनी सी कहां थी जो रात कट सकती नहीं
ऐ खुदा मंज़र तूने कुछ सोंच के दिखलाये हैं
हम हमारे हम से हैं किसी के हो सकते नहीं।

मैं कहा से लेके आऊं इस जमाने में ख़ुशी
पेड़, पत्ते,फल, परिंदे कब तलक रह पाएंगे
तू सोंच ले तेरी कमी को हमने तो समझा नहीं
अपनी ही बस आरजू में हम कहीं रहते नहीं।

जान ले जो राज़ तेरा तो खुदा हो जायेगा
दूर हो जा खुद से तू ये कही खो जायेगा
वो खुश है खुश रहे जो खफ़ा है रहे खफ़ा
हर किसी को हम हमारा हमदम बना सकते नहीं।

उस नदी का क्या हुआ जो चाँद को तकती रही
सबको मिलने के बहाने वो सदा बहती रही
जिंदगी को इस तरह से हम भी तो बहायेंगे
बहते बहते हो सकेे तो चाँद भी हो जायेंगे


फूल बनके खिलखिलाना एक अलग ही बात है
जिंदगी हो खूबसूरत जब हमदम हमारे साथ है
तू हो रहा है मुझसे भी और खुदसे भी क्यों खफ़ा
ये कायनातही दिल तेरा खुदबखुद बेहलायेगी

Saturday, April 1, 2017

किस्से

खिलखिलाती धूप को मोहताज़ तू हो जायेगा,
ज़िंदगी की साँस पर हर जुर्म फिर खिल जायेगा।
यूँ हो रहा है आदमी कैसे सनम मेरे खुदा,
कि भूल कर भी न मिटे वो फासला हो जायेगा।

फिर भी सारे किस्से यूँ मिट्टी में मिल जाएंगे,
ज़िंदगी जो थी हसीं वो फिर गुनाह हो जायेगी।
गर हो सके तो मौत से मिलना तुम यूँ ही कभी,
और हँसते खिलखिलाते गुमशुदा हो जायेगा।

अपनी अपनी चाहतो का सबको ही है एक नशा,
फिर ख़ुशी के वास्ते कोई भी जी न पायेगा।
हो गए है जिंदगी से दूर कितने फासले,
की साँस की हर लय को फिर कैसे तू दोहरायेगा।

जो हकीक़त न रही है उसको फिर हो मलाल क्यूँ,
चाँद तेरा चाँदनी से कब मिला मिल पायेगा।
है खुशनुमा तो जिंदगी भी हो ख़ुशी से यूँ बसर,
बीती बातें सोच कर तू फिर वही दोहरायेगा।

Friday, October 30, 2015

मौसम आये मौसम जाये

एक पेड पर कई है पंछी
क्या मौसम आये मौसम जाये
डर है कैसा भुला दे हसी
वो मौसम आये मौसम जाये

छोड छाड सब काम काज वो
बैठा रहता कशमकश में
कौन जाने किस बखत ये
मौसम आये मौसम जाये

होना उसना अनहोनी से
गुजर गया लौटा ना कभी
कैसे कैसे मंजर सोचे
ना मौसम आये मौसम जाये

सारी सारी रात जागी
फिर सुबह कि आस लिये
किस की कैसी रातें गुजरी
क्युं मौसम आये मौसम जाये

समय समय पर याद आये
तेरा जाना खोना युही
फिर वही है यादे अपनी
युं मौसम आये मौसम जाये

Saturday, May 16, 2015

सोये है..!

मशवरा हक़ीम से लेकर सोये है,
बरसो बाद ग़म ए हबीब के सोये है..!
रात गुजर जाये तो जगा देना ऐ सुबह,
नाबिना इश्क से बेखबर होकर सोये है...!
न जाने क्या जताना चाहते है,
जो उस तरफ मुड के सोयेहै...!
तुम्हारे जागने की वज़ह तुम जानो,
दुनियावाले बेखबर होकर सोये है..!

Thursday, September 19, 2013

मुसाफ़िर

बेहिसाब तमन्नाओं का मेला लेकर जब एक मुसाफ़िर कही जा पहुचा तो उसने देखा के जरूरत की हर चीज वहा मौज़ुद थी.. बडी बडी इमारतें, चमचमाती गाडीया, रंगीन दुकाने, चकाचौंद कर देनेवाली रात की रौशनी और एक प्यारा सा समुन्दर. मानो मन लग गया उसका वही पर.. शुरूवात में उसकी कई तमन्नायें वहां पुरी होती नजर आ रही थी... इतनी रफ्तार से जी रहा था के जिन्दगी जैसे चंद पलो की मोहताज हो. हर वक्त नये लोग.. नई दुनिया.. नये रिश्तें सब कुछ हर दुसरे पल में नया.. सब कुछ इतनी सफाई से हो रहा था मानो पेहले से ही तय हो.. फिर वही मुसाफ़िर एक दिन अपनी जिन्दगी का हिसाब जोडने लगा और मात खा गया. हाथ आया कुछ भी...नहीं पाया कुछ भी नहीं.. बस बेहिसाब जरूरते और तमन्नायें बेहिसाब....!

Sunday, August 11, 2013

किसी दिन घुमने चलेंगे..

कहां था किसी दिन घुमने चलेंगे.. कहीं भी जहां पर ये शोर..ये भीड.. ये ब्यापारी जगत से दूर... बहोत दूर .. उसी बात का वास्ता देकर तुम जिन्दगी बनकर मेरा साथ निभा रही थी.. और मैं तुम्हारा किमती वक्त खर्च कर रहा था.. कभी इंतजार में तो कभी मनाने मे तुम्हे मसरूफ़ रखने कि कोशिश मे लगा रेहता था... मै भी भला कैसे मजबूर हो गया हूं.. जिन्दगी के बहाने वो सारे पल.. वो वक्त बेच ही दिये है मैनें.. जिसके सहारे कभी जिने की आरजू बनी रेहती थी.. अब और खर्च करने के लिये कुछ नही बचा हैं कुछ भी नही बचा पास मेरे.. यूं कभी कहीं वक्त मिले तो चल पडेंगे सोचा था.. कहां था किसी दिन घुमने चलेंगे....!

Sunday, February 19, 2012

हैं ना...!

कल तुम्हारे जाने के बाद सारा शहर मुझसे खफ़ा हो बैठा था
याद है वो रात जो हमने कभी इसी शहर की राहों पर गुज़ारी थी
शहर की कई मंजिला इमारतें मानो हमें झुककर सलाम कर रही थी.
चलते चलते जब हम हमारी पसंदीदा जगह पर आए
तो पाया कि आज भी वो जगह हमारे लिए खाली पड़ी थी
जैसे सदियों से हक हो हमारा उस पर
वहां से समुंदर कितना निराला लगता था
जैसे कुछ सवाल हमारे
कुछ उसके
आधे अधूरे छोड़कर उन्हीं के जवाब ढूंढता फिरता था
हर लहर को इतनी सादगी से पेश करता था
मानो देखनेवाले उसकी अंदरूनी हरकतों से वाकिफ़ ही न हों
फिर वहां से चलकर हम पूरे रास्ते
एक दूसरे का हाथ थामे
मरीन ड्राइव के दूसरे छोर पर चलते चले जाते
जहां रेत की कई निशानियां हमें जानी पहचानी छुअन का एहसास दिलाती थी
और सर्र से गुज़र जाती पैरों तले
फिर एहसास होता कि अब चलना चाहिए
देर जो हो जाती थी
आखिर समय भी किसी का हुआ है भला
यकीन नहीं आता तो देख लो
आज फिर तुम्हारे जाने के बाद सारा शहर मुझसे खफ़ा हो बैठा है...

तुम

मेरी आदतों को अब तुम बखूबी समझने लगी हो
मेरे कुछ कहने से पेहले ही आंखों से इशारे कर देती हो
जैसे तुम्हें मेरा हर अल्फाज़ मुंहजबानी याद हो
फिर भी तुम्हारी ख़ामोशी कई सारे सवालात छोड़ जाती है
मेरी नासमझ नज़रें नहीं समझ पाती तुम्हारे चेहरे की जुंबिश को..
शायद किसी जनम की पहेली हो तुम मेरे लिए
जिसे इस जनम में सुलझाना है मुझे...
कोशिश अच्छी कर लेता हूं ये भी जानती हो तुम
और उसी की खातिर हर बार नए सवाल छोड़ जाती हो..
कितनी आसानी से टाल देती हो मेरी गलतियों को
गलतियों का एहसास तो कोई भी करा देता है
पर तुम कभी-कभी उनको सुधार देती हो
बड़ा अच्छा लगता है जब तुम हंसकर कहती हो
कि तुम जैसे हो मेरे हो..
इतने विश्वास से कभी मैंने भी अपने आप से ये न कहा होगा
जो कुछ भी सुना था प्यार के बारे में कम था
आज महसूस किया है तुमसे मिलकर वो उससे कहीं ज्यादा बढ़कर है
फिर भी याद रखना मैं अपनी हरकतों से बाज न आऊंगा
जानता हूं मेरी आदतों को अब तुम बखूबी समझने लगी हो...

Sunday, September 25, 2011

भेट

भेटलीस तू अचानक रोखल्या श्वासापरी
काळही मग थांबला लाजऱ्या भासापरी
अंतरीच्या वेदनेशी मी कधी न बोललो
राहूदे तिजला मनाशी एकटा असण्यापरी
ज्या दिशेने संथ वारा येत आहे आज हा
त्या दिशेवर प्रेम माझे असले तरी नसलेतरी
तो तुझ्या जगण्यातला ‘मी’ पणा गेला कुठे
स्वाभिमानी तू दिसावं असलातरी नसलातरी

Thursday, January 27, 2011

मी .....“तो”

मी कधीतरी येईन तुझ्या भेटीला तेव्हा असेल माझ्यासोबत तुझ्या स्वप्नांचं जग..
जे मी आता अस्तित्वात साकारलं आहे...तुला आवडणारी गाणी..रंग..शब्द..संगीत..असतील सोबतीला...
तुझ्या नजरेतील त्या घरट्याची सावली हुबेहूब उभी असेल...
तुझ्या स्वप्नातील “मी” मात्र “तो” तसा नसेन कदाचित कारण
तुझ्या स्वप्नांना अस्तित्वाचा आकार देता-देता मी पण त्या अस्तित्वाचा एक भाग झालेला असेन...
आणि अस्तित्वातला मी तुझ्या स्वप्नातल्या त्याच्यासारखा होऊ शकणार नाही...
तरीही.. मी कधीतरी येईन तुझ्या भेटीला तेव्हा असेल माझ्यासोबत..

Saturday, January 8, 2011

अंदाज

न भेटताच निरोप घेशील असं वाटलं होतं...पण भेटून निरोप घेतलास हे बरं केलंस..तुझ्या बाबतीत माझे अंदाज चुकतात हे तू पुन्हा सिद्ध केलंस...तुला आठवते आपली पहिली भेट, कशी आठवेल? तुझ्यासाठी तेवढी महत्त्वाची नसेल कदाचित .पण मी मात्र आतुरतेने वाट पाहत असावा त्या क्षणाची.. तु आलीस आणि पहिला अंदाज तिथेच चुकला माझा.. तुझ्या न येण्याचा... असे अनेक अंदाज तु हिमतीने मोडून पाडलेस..आणि मी मात्र जुगाऱ्यासारखा खेळत होतो माझ्याच भावनांशी... अंदाज..!!!, किती छान आहे ना हा शब्द.. संपूर्ण जग या शब्दाच्या अधिपत्याखाली आल्यासारखं भासतं बरेचदा... एक सांगू खरंतर मी आता कुठलाही अंदाज मनाशी बाळगत नाही.. कारण माझे अंदाज काही खरे ठरत नाही...

Thursday, April 29, 2010

संध्याकाळ

पुन्हा संध्याकाळ झाली...पुन्हा अंधार होतोय हळुहळू ...

अन .....परततायेत पाखरं आप-आपल्या घरट्यात....

ज्यांना घरटंच नाही अशी पाखरं.....

घालतायेत गिरक्या...आकाशी....पुन्हा सकाळची वाट पाहत...

कारण रात्र...संपता संपत नाही....त्यांच्यासाठी......

पुन्हा संध्याकाळ झाली...पुन्हा अंधार होतोय हळुहळू......!!!

Friday, April 23, 2010

कोकण..

मला जावसं वाटतंय कोकणात ...
सागरी किनारी ...शांत सागरी किनारी......
जिथे फक्त असावा लाटांचा आवाज अन ढगांचा गडगडाट ....
शांत....ढगाळ वातावरण....खाली वाळू....
वर वाळू....आणि मध्ये मी ....लोळतोय एकांतात...
विचार करतोय स्वत:चा अन त्या लाटांचा.....
की एकदा भेटून गेलेली लाट भेटेन अशी पुन्हा एकांतात.....???
मला जावसं वाटतंय कोकणात....
सागरी किनारी ...शांत सागरी किनारी.......

घटना

घटना घडून गेल्या की आठवतात....
अन आठवतच राहतात...आठवणी.....बऱ्याचदा.....
काही झाडांवरील वेलीसारख्या वाढतात....तर काही...
तरंगत राहतात....अधांतरी पाण्यातील ओंडक्याप्रमाणे....
त्या सर्वांनाच आठवतात....तशा....
मी मात्र उगीचंच कारणं शोधत राहतो त्या मागची...
बऱ्याच घटना घडून गेल्या की आठवतात.......!!!

मन

वाद झाला आज पुन्हा त्याचा आणि माझा .....
म्हणजे संवाद दररोज होतच असतो....पण आजचा वाद....
होता त्याच्या आणि माझ्या अस्तित्वाबद्दलचा.......
म्हणे माझ्यावाचून तुझे पानंही हलणार नाही.....
मी का ऐकून घ्यावं त्याचं...???..
त्याच्यामुळेच माझं अस्तित्व आहे म्हणे...
म्हणजे मी कोणीच नाही..???
माझा ....आत्मसन्मानही त्याचीच कृपा आहे म्हणे......
मी तुझ्यावर हुकूम गाजवतो... ’मन’ असलं म्हणून काय झालं....
मग वाट्टेल ते बोलेल आणि मी ऐकून घेऊनिमूटपणे.....?
नाही जमणार.....
हो वाद झाला आज पुन्हा त्याचा आणि माझा.....??

Tuesday, December 22, 2009

कला

परखूनी घेतो मी प्रिये
माझे मीच मला
आयुष्य जगण्याची आता
हीच खरी कला,
होतो उदास एकटा
मी जरी असा कधी
नाचून घेतो, गाऊन घेतो
वाचून घेतो मीच मला,
राहुदे शब्द माझे
सारे सखे तुझ्याकडे
जाता जाता देऊन जा
कविता माझी तीच मला,

Friday, September 4, 2009

चार ओळी जगण्यातल्या.....

१)
स्वतःपुरतं जगतांनाही
एक गोष्ट लक्षात आहे..
या जगात प्रत्येक जीव
माझ्या सारखा निस्वार्थ आहे...

२)
ईजा मला भरपूर झाल्या
माझ्या लहानपणी...
त्यांचीच साथ झाली मला
माझ्या शहाणपणी....

३)
प्रत्येक घटनेचा जगण्यावर जर
सखोल परिणाम झाला असता....
कदाचित माझ्या जगण्याचा तिथेच
विराम झाला असता.....

४)
जगण्याच्या बर्‍याच अर्थांना
मी जगतांना मुकलो आहे...
याचा अर्थ मी जगतांना
बर्‍याचदा चुकलो आहे...????

५)
स्पष्ठ बोलणारे अधिक
आवडाया लागले...
अस्पष्ठ बोलण्याचे जेंव्हा
स्वार्थ कळाया लागले...

६)
स्वार्थ जगण्याचे अनेक
टाळतो नेहमी...
तरी नियम जगायचे
पाळतो नेहमी...

७)
एकदा तरी जाता जाता
जर तू मागे वळली असती...
प्रीत माझ्या हृदयातली
सहज तुला कळली असती....

Sunday, August 9, 2009

इंद्रधनुष्य

काळजांचे इंद्रधनुष्य मी पाहीले
प्रत्येकाचे रंग वेगळे मी पाहीले.

या बेढंग दुनियेत जरी मी बेरंग असा
तरी माझेच रंग मी प्रत्येकात पाहीले,

जगलो,
जगलो जीवन जरी एकटाच मी
एकांतात माझ्या विश्व मी पाहीले,

असो,
असो महल तुझा लाख कोटिचा
घरट्यास का माझ्या तुच्छ तु पाहीले

हसतात,
हसतात मैफिलीत जे मोठ्याने
डोळ्यांत त्यांच्या नेहमी अश्रृ मी पाहीले,

Tuesday, July 21, 2009

.....दुरावा...

वाटे हवा हवासा जगण्यातला दुरावा
मी सत्य आहे याचा काय देवू पुरावा,
जगण्याचा माझ्या आहे हेतू जरा निराळा
फक्त विचार माझा माझ्या मागे उरावा,
ठरले असेल खोटे कित्येक बोलणे माझे
मर्म बोलण्याचा तुला तरी कळावा,
समजूत या मनाची घालू कशी मी आता
घडलेल्या त्या कथेचा विसर कसा पडावा,

Monday, June 8, 2009

तनहाईया

मेरी तनहाईयो को मुझसे यूं जुदा ना करो
मेरे साथ भला और कौन रेह पायेगा,

मुझसे ना कर वफा ऐ मेरे सनम
तेरी बेवफाई को ये दिल न सेह पायेगा,
मेरे साथ भला और कौन रेह पायेगा,,.....

वो तो मुस्कुराकर हर गम टाल देते है
इसतरहा गममे कौन मुस्कुरा पायेगा,
मेरे साथ भला और कौन रेह पायेगा,,.....

वा मेरे यार तेरी यारी को सलाम
मेरी बदनामी और कौन सेह पायेगा,
मेरे साथ भला और कौन रेह पायेगा,,.....

मुस्कुराते वो मुझसे युं जुदा हुये
उनको था यकींन ये अकेला रेह् पायेगा
मेरे साथ भला और कौन रेह पायेगा,,.....


मेरी तनहाईयो को मुझसे यूं जुदा ना करो
मेरे साथ भला और कौन रेह पायेगा,,....

Tuesday, June 2, 2009

खेळ

माझ्यात खेळतात माझी रूपे निराळी
मी काय नाटकाचे आता प्रयोग पाहू.....
झाली दशाही आता माझी तुझ्या परीरे
मी काय हासण्याचे आता सुयोग पाहू....
ते स्वर छेडताची दाटूनी कंठ येतो
मी काय जीवनाचे आता वियोग गाऊ....
नजरेत जर तिच्याही असेल भास खोटा
मी का भेटण्याचे निस्वार्थ योग पाहू....
नाही, जरासा मीही भितो या जिवनाला
मी का जगावयाचे खोटे अभोग गाऊ......

Wednesday, May 27, 2009

याद

याद तो याद है भुलाता कैसे
उनसे यु नजरे चुराता कैसे,

वो मेरे बारे मे सोचे तो कुछ हो
मै उसे उम्रभर सोचता कैसे,

जिनको छुना भी मुझे मुनासिब न था
उनको खयालोमेभी चुमता कैसे,

वो मेरे यार से लगते है लेकिन
मै उन्हे अपना बनाता कैसे,

जलने के बाद भी जलती रही दुनिया
मै जलनेवालो को बुझाता कैसे,

चलना तो वक्त के साथ है युही
मै वहा अकेला रुकता कैसे,

चारसू उनकिही खुशबू है "यकीन"
मै उन्हे हर तरफ़ खोजता कैसे....
याद तो याद है भुलाता कैसे
उनसे यु नजरे चुराता कैसे,

Wednesday, May 20, 2009

जिन्दगी

जिन्दगी को हर जगह
ढूंडता रहा हू मै
हर पल यही मौत से
केह्ता रहा हू मै

वो कही मिल जाये तो
आउंगा हसते-हसते
यही बात अपनी मझार से
केहता रहा हू मै....
जिन्दगी को हर जगह ...


हसना मेरी फितरत
रोना मेरा नसीब
हस हस कर अपने नसीब को
सेह्ता रहा हू मै....
जिन्दगी को हर जगह ...


पीने की नथी यू आदत मूझको
एक दीन बस यूही पीली
उसी बात की अफ़सोसपे अबतक
पी रहा हू मै....
जिन्दगी को हर जगह ...


बीना मुर्झाये मूद्दतो
कैसे रहे "यकीन"
यही बात कांटोसे
पूंछता रहा हू मै...
जिन्दगी को हर जगह ...

सर

आयुष्याच्या वळणावरती
पाऊल माझे डगमगेल जेव्हा
तुमची आठवण येईल तेव्हा
सर तुमची आठवण येईल तेव्हा...

असेन मी एकटा
नसेल कोणी सोबती
वळून मागे फिरेन जेव्हा
तुमची आठवण येईल तेव्हा
सर तुमची आठवण येईल तेव्हा...

कोण इथे तत्वज्ञानी
होतो सांगा जन्मत:
मी माझा विचार करेन जेव्हा
तुमची आठवण येईल तेव्हा
सर तुमची आठवण येईल तेव्हा...

माझ्या या असण्यातही
कित्येकांचे उपकार आहे
एक-एक नाव मी घेईन जेव्हा
तुमची आठवण येईल तेव्हा
सर तुमची आठवण येईल तेव्हा...

Sunday, March 22, 2009

रकीब

हर राज अपने सिने मे
दफ़्नाकर जीना पडता है,
अपनेही रकीब से
मुस्कुराकर मिलना पडता है...

उनसे मिलने लगी है
हमको मोहब्बत इतनी,
बनकर उन्हीकी परछाई
अब हमको चलना पडता है...

सुना है उनको हो गई
अब रोशनी से मोहब्बत,
उनकी खुशीकी खातीर
अब हमको जलना पडता है...

हर जुबा हर अल्फ़ाज
दिलपे दस्तक देगी,
बस बोलने वालो को हरबार
बडे गौरसे सुनना पडता है...

मेरी सच्चाईया जहॉंमे
बया ना करदे कही,
आज कल आईनेसे भी
डरना पडता है...

हर राज अपने सिने मे
दफ़्नाकर जीना पडता है,
अपनेही रकीब से
मुस्कुराके मिलना पडता है...

Wednesday, March 18, 2009

आदमी

बिखरा बिखरा सा ये जहॉ
है टूटा टूटासा आदमी,

अब कौन यहा सच बोलेगा
है झूठा झूठासा आदमी,

जब काम किसीसे होवे तो
है मीठा मीठासा आदमी,

सबसे बडा पैसा यहा
है छोटा छोटासा आदमी,

खुशियो के पिछे भागे
है रूठा रूठासा आदमी,

जात-पात और ऊच-नीच
है बटा बटासा आदमी,

ना रहा नामो निशान
है मिटामिटा सा आदमी...

बिखरा बिखरा सा ये जहॉ
है टूटा टूटासा आदमी......

Sunday, March 15, 2009

झोका..


झोक्यावर आठवणींच्या मन माझे जेव्हा झुलते
एक-एक तुझी मग तेव्हा मज भेट प्रिये स्मरते,


कधी एके काळी तुझ्यासवे ज्या ज्याही ठिकाणी बसलो
एकाकी तिथेही तेव्हा मन माझे जावुनी बसते,
एक-एक तुझी मग तेव्हा....


ओठात तुझ्याही आज प्रिये माझेही नाव असावे
स्मरते ही बाब जेव्हा मन माझे खुदकन हसते,
एक-एक तुझी मग तेव्हा.....


संपला तो खेळही जीवलगे संपली ती रात सुहानी
अंधारल्या पहाटे मन माझे तीळ तीळ जळ्ते,
एक-एक तुझी मग तेव्हा.....


झोक्यावर आठवणींच्या मन माझे जेव्हा झुलते
एक-एक तुझी मग तेव्हा मज भेट प्रिये स्मरते,