जी बहलाने का कोई ज़रिया ढूँँढोंं तुम
डूब जाने को कोई दरिया ढूँँढोंं तुम
जात-पात धर्म-पंथ, बस भी करो
इनसे परे भी कोई नज़रियाँँ ढूँँढोंं तुम
क्या कोई अपनाए और कोई ठुकराए
ख़ुद को जो भाये ऐसा रवैय्या ढूँँढोंं तुम
स्नेह में लिपटी चाह से भरपूर हो
मन से मन की कोई डगरियाँँ ढूँँढोंं तुम
बेईमान हो गये हो दुनिया की नज़रो में तो
बेईमानों से अलग कोई दुनिया ढूंढो तुम
जिस्म की आग अगर बुझ गई हो तो
मन के लिए भी कोई गवैया ढूँँढोंं तुम
एक था राज्य, राजा जिसका आदर्श था
आज-कल ना ऐसी कहानियाँँ ढूँँढोंं तुम
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