Friday, April 6, 2018

दायरा


सलामती के दायरे से निकलोंं कभी
तुम अपने "आप" से निकलोंं कभी,

हो सके तो चाँद भी आएगा ज़मीं पर
तुम खुले आसमाँँ में निकलों कभी,

जल गये तो राख़ भी हो जाए यक़ीनन
चिनगारी बन धुंए में से निकलोंं कभी

वो यारीयाँँ-विरानियाँँ मेरेही किस्से हैं
गर तुम मेरे यार से निकलोंं कभी

एक घाव जो भर गया वक्त़ के साथ
लेकर हिसाब़ ईलाज का निकलोंं कभी

मैने जो मान लिया सच हो गया
झूठ है तो, झूठ भी निकलोंं कभी

सफ़र हमसफ़र तय होते नहीं यहाँँ
ये फ़रिश्तों की देन हैं तुम निकलोंं कभी

पानी का बहाव है बह ना जाना कहीं
ये दुनिया मायाजाल है निकलोंं कभी

सियासत की बेईमानी साबित करो
बन कारवां-ए-इन्कलाब निकलोंं कभी


No comments: