सुबह होते ही रोजगार पर निकल पडते हैं
जरूरतों की आड़ में ना जाने कितने ख्व़ाब मरते हैं,
नन्ही सी आखों को गौर से देखना कभी
फ़रिश्तों की दुनिया के जिनमें ख्व़ाब पलते हैंं,
मेरी बाते फिज़ूल है इनपर तुम ना गौर करो
शक्स कोई ढूंढो ऐसा, जिससे ख़याल मिलते है,
वक्त मिले फुरसत का तो सोचना ज़रूर
हम किससे और किस-किस बात पर लड़ते हैंं,
शुक्रिया शब-ए-रहमत मुक्कमल दिन गुजरा
ख्वाबो का वक्त हो गया, अब सुबह मिलते हैंं..!
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