किसने सोचा था,
संसार इतना गहन होगा?
जीवनभर उद्धार हो जिसका,
उसका अंत में पतन होगा?
नर, नारी, ज्ञानी, गुनीजन
सबकी एक दुविधा थी,
जीवन भर जतन क्या करना
जो यज्ञजीवन कि समिधा थी?
ऐसे सारे सवाल जो बिते
समय चक्र के काल में,
कहो युगंधर क्या
यह है जीवन
क्षण-क्षण के
संहार में?
पल जो आए चलता जाए
अनंत तृष्णा - चाह में?
उपदेश तुम्हारे
ऐसे जाने आदेश
समझ स्विकार करे?
पार्थ कहो
फिर क्या मृत्यू से
उठकर मोक्ष प्राप्त करे?
सब ने अपने कर्म किये
पर फल तो सभी का एक था?
मृत्यू ही तो पाई अंत में,
फिर जीवन भर थी दुविधा क्या?
संसार इतना गहन होगा?
जीवनभर उद्धार हो जिसका,
उसका अंत में पतन होगा?
नर, नारी, ज्ञानी, गुनीजन
सबकी एक दुविधा थी,
जीवन भर जतन क्या करना
जो यज्ञजीवन कि समिधा थी?
ऐसे सारे सवाल जो बिते
समय चक्र के काल में,
कहो युगंधर क्या
यह है जीवन
क्षण-क्षण के
संहार में?
पल जो आए चलता जाए
अनंत तृष्णा - चाह में?
उपदेश तुम्हारे
ऐसे जाने आदेश
समझ स्विकार करे?
पार्थ कहो
फिर क्या मृत्यू से
उठकर मोक्ष प्राप्त करे?
सब ने अपने कर्म किये
पर फल तो सभी का एक था?
मृत्यू ही तो पाई अंत में,
फिर जीवन भर थी दुविधा क्या?
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