सुख की चिंता सब करे
सुखी ना कोई होए,
सुख बैठा अंतर्मन में
दर्शन कैसे होए।
बात बात पर लड़ पडे
मानव है या श्वान,
झूठी तेरी शौकत है
और झूठी तेरी शान।
मन मंदिर तो कह दिया
पर भीतर अंधःकार,
चेतना को लज्जीत करे
लालच लोभ महान।
कथनी तो कथनी भई
करनी कभी ना होए,
भोग में जीवन बिते
तृप्त कभी ना होए।
बैठे बैठे सब चाही
कर्म करे ना प्रयास,
समय चले अपनी गति
मन में केवल आस।
संयम से ही सब मिले
संयम कहाँँ से लाए,
संयम संयम रटते रटते
अति अधीर हो जाए।
मीरा जाने प्रेम को
ना प्यासी ना उदास,
प्रेम ऐसी प्रीत है
सदा हरि के पास।
सुखी ना कोई होए,
सुख बैठा अंतर्मन में
दर्शन कैसे होए।
बात बात पर लड़ पडे
मानव है या श्वान,
झूठी तेरी शौकत है
और झूठी तेरी शान।
मन मंदिर तो कह दिया
पर भीतर अंधःकार,
चेतना को लज्जीत करे
लालच लोभ महान।
कथनी तो कथनी भई
करनी कभी ना होए,
भोग में जीवन बिते
तृप्त कभी ना होए।
बैठे बैठे सब चाही
कर्म करे ना प्रयास,
समय चले अपनी गति
मन में केवल आस।
संयम से ही सब मिले
संयम कहाँँ से लाए,
संयम संयम रटते रटते
अति अधीर हो जाए।
मीरा जाने प्रेम को
ना प्यासी ना उदास,
प्रेम ऐसी प्रीत है
सदा हरि के पास।
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