Wednesday, April 4, 2018

शिष्टाचार


एक लड़का लड़की मिल बैठे 
जो ना करनी थी, कर बैठे 

ऐसी भी क्या बात हुई 
आख़िर तुम मिले ही क्यों?
जो मान सके ना समाज 
फूल ऐसे खिले ही क्यों?

फिर देखो हाहाकार हुआ 
लोगों के मन में विकार हुआ 
कोई कहे दफना दो 
कोई कहे जला दो

जब युक्तिवाद ही करना था 
तब गोत्र सबको सुनना था 
ये तुमने कैसा पाप किया 
कुल को क्यों बदनाम किया? 

सबको जाने क्या खलती थी 
वो बात दिल से निकलती थी 
ये वध है अपनी प्रतिष्ठा का
सम्मान का, संस्कार का  

जाने किस संस्कार की बातें ?
लोग कर रहे अधिकार की बातें 
मिल लिए जिनको मिलना था 
नही संभले जब संभलना था 

हर किसी रिश्ते के पहले
वे दोनों नर और नारी थे 
अपने अपने जीवन के 
वे स्वयं अधिकारी थे  

अब बात जो संस्कारों की 
समाज के अधिकारों की 
तो उत्तर भी एक दे देना 
जब पंछी पिंजरे में बंधे 
क्या भूल जाता है वो उड़ना? 

कितने रीति-रिवाजों को 
हमने बनाया मिटाया क्यों?
लोगों के जीने मरने पर 
हमने अधिकार जताया क्यों?

हर रिश्ते को रखो सामने 
एक बात ज़रा तुम पूछो तो? 
क्यों रहते हैं हम साथ निरंतर 
क्या है पहेली बूझो तो?

खेल सारा ज़रूरतों का 
ना समझा कोई ना मानेगा 
जो कहे बात ऐसी 
वो दंड समाज से पाएगा

कर देंगे अपमानित उसको 
जो चौखट को पार करे
क्या होगा समाज इस से 
अनुकूल पात्र सबके लिए?

नर-नारी का संदर्भ लेकर 
बात शुरू करनी थी 
हर रिवाज को परखो समझो 
बस बात यही तो रखनी थी 

क्यों कहते हैं हम लोगों से 
तुम नैतिकता के ध्यानी हो 
नहीं करे जो मान्य तुम्हारी 
वो तो निर्बुद्ध अज्ञानी हो 

हर रिश्ते में ख़ुद को देखो 
फिर देखो तुम रिश्ते को 
जीवन सहज-सरल हो जाये 
ऐसे रखो निर्बंधो को 

अगली बार तुम ये करना 
जब कहीं भी निर्बंध हो 
अनुकूलता को समझो उसकी 
जो इसका आश्वासित हो 

बचा कुछ जो शिष्टाचार है 
उसको अब ना लज्जित करो 
जिसको जैसे भाता है 
वैसा जीवन व्यतीत करो...


No comments: