आंखों देखी, कानों सुनी कुछ नहीं होती
अनुभव की वो सारी बातें सच नहीं होती,
ज़िंदा रहने की कोशिश में उलझे अगर हो
मौत की आहट कहो तो दिल में अब नहीं होती,
कुदरत से सीखा हों जिसने देने का धर्म
उसके लिए ख़ुद की ज़रूरत सब नहीं होती,
वैसे तो ज़रूरत की देखो बात ही अलग हैं
कितना भी मिले मगर तबियत ख़ुश नहीं होती,
घना कोहरा, बिखरे गेसू, मध्यम सांसे
एक मौसम की वो शरारत अब नहीं होती,
और सुनाओ हाल तुम्हारा अब कैसा है
दिल बहलाने की कोई करामत अब नहीं होती?
अनुभव की वो सारी बातें सच नहीं होती,
ज़िंदा रहने की कोशिश में उलझे अगर हो
मौत की आहट कहो तो दिल में अब नहीं होती,
कुदरत से सीखा हों जिसने देने का धर्म
उसके लिए ख़ुद की ज़रूरत सब नहीं होती,
वैसे तो ज़रूरत की देखो बात ही अलग हैं
कितना भी मिले मगर तबियत ख़ुश नहीं होती,
घना कोहरा, बिखरे गेसू, मध्यम सांसे
एक मौसम की वो शरारत अब नहीं होती,
और सुनाओ हाल तुम्हारा अब कैसा है
दिल बहलाने की कोई करामत अब नहीं होती?
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