Friday, May 1, 2020

कोई नज़्म नहीं आयी

कोई नज़्म नहीं आयी

आज पूरा दिन रिक्त, सूना-सूना था
मद्धिम हुई थी शाम तो सूरज भुना-भुना था,
फिर अंगड़ाई लेकर संध्या धीमे - धीमे रात हुई
ना जानें फिर भी आज ज़ेहन में कोई नज़्म नहीं आयी ।

ना कहीं  जाना हुआ ना किसी से बात हुई
दो - चार किताबें, कुछ ग़ज़लें इनकी पूरी साथ रही,
साज़ छेड़ा कुछ पल भर तो सूर में भी हरकत पाई
ना जानें फिर भी आज ज़ेहन में कोई नज़्म नहीं आयी ।

तस्वीरों का गट्ठा खोला बचपन से भी मिल आए
एक कहानी टीव्ही पर भी बचपन की यादें जी आए,
इस करवट से उस करवट बस बैचेनी ही है पाई
ना जानें फिर भी आज ज़ेहन में कोई नज़्म नहीं आयी ।

समय का पहिया धीरे धीरे, आगे-आगे बढ़ता है
अतीत और भविष्य हमेशा वर्तमान से लढ़ता है,
क्या मिटाएं क्या बनाएं बात समझ में नहीं आयी
ना जानें फिर भी आज ज़ेहन में कोई नज़्म नहीं आयी ।


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