Friday, May 1, 2020

गंगा

गंगा का हर रूप सुहाना मन को लुभाता जाएं
जिसकी पावन जलधारा में जीवन बहता जाएं।

हो भागीरथी या अलकनंदा इसके नाम अनेक
हर "प्रयाग " में रूप नया, हर रंग उभरता जाएं।

हिमालय से हो विदा, गंगासागर तट तक आये,
हर एक छोटी बड़ी नेहर इसमें समाती जाएं।

कितना पावन अमृत जल हैं इसके कई उपाय,
बूंद बूंद से सृष्टि सारी तृप्त - तृप्त हो जाएं !

इसकी अद्भुत ख़ुशबू से परिसर पावन होता है
इसके केवल स्पर्श से , धरा देवभूमि कहलाए ।

ऋषिमुनी की तपोभूमि है इसका घर आंगन
ये देती हैं सबको सहारा, गंगा मैया कहलाए

मिलो कभी जो इस धारा से, इसकी ख़ुशबू लेना तुम
इसको गले लगाने से एक पर्व पूर्ण हो जाए । 

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