Friday, May 1, 2020

मेरे हिस्से की दुनिया

फ़िलहाल,
दुनियां मेरे हिस्से की और भी बड़ी हो गई हैं,
अब काफ़ी समय रहता है
बहुत कुछ करने के लिए,
जैसे एक संदूक, जिस में मेरा बचपन
महफूज़ रखा था
उस से मुलाक़ात होती है बार बार,
स्कूल की यादें, वहां से जुड़े लोग,
कुछ ख़ास निशानियां,
सब से मुलाक़ात होती हैं, बात होती है,
अब याद कर लेता हूं उन जगहों को,
जहां जाकर ज़िन्दगी नई सी हो गई थी,
और फ़िर नई हो जाती हैं,
चैन से सुकून से फ़ुरसत से चल रहा है सब,
कभी खाना बना लिया, कभी गाया, बजा लिया,
कभी सोए, तो कभी पूरी रात को जी लिया,
अच्छी बातें, बहुत सी किताबें, कुछ खिलौने, सब
ना कहीं जाने की चिंता,
ना कहीं पोहोचने का टेंशन,
पड़े है मस्त, अपनी जगह पर,
फ़िर सोचू तो लगता है,
कई ऐसे भी होंगे
जिन्हें इनके बजाय
खालीपन मिला होगा, अकेलापन,
चिंता मिली होगी, डर मिला होगा,
भूख मिली होगी, लाचारी मिली होगी,
परेशानियां मिली होगी
दुनियां उनके हिस्से की क्या हो गई होगी? 

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