कहां था किसी दिन घुमने चलेंगे..
कहीं भी जहां पर ये शोर..ये भीड..
ये ब्यापारी जगत से दूर...
बहोत दूर ..
उसी बात का वास्ता देकर
तुम जिन्दगी बनकर मेरा साथ निभा रही थी..
और मैं तुम्हारा किमती वक्त खर्च कर रहा था..
कभी इंतजार में तो कभी मनाने मे
तुम्हे मसरूफ़ रखने कि कोशिश मे लगा रेहता था...
मै भी भला कैसे मजबूर हो गया हूं..
जिन्दगी के बहाने वो सारे पल.. वो वक्त बेच ही दिये है मैनें..
जिसके सहारे कभी जिने की आरजू बनी रेहती थी..
अब और खर्च करने के लिये कुछ नही बचा हैं
कुछ भी नही बचा पास मेरे..
यूं कभी कहीं वक्त मिले तो चल पडेंगे सोचा था..
कहां था किसी दिन घुमने चलेंगे....!
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