Thursday, September 19, 2013
मुसाफ़िर
बेहिसाब तमन्नाओं का मेला लेकर जब एक मुसाफ़िर कही जा पहुचा
तो उसने देखा के जरूरत की हर चीज वहा मौज़ुद थी..
बडी बडी इमारतें, चमचमाती गाडीया, रंगीन दुकाने,
चकाचौंद कर देनेवाली रात की रौशनी और एक प्यारा सा समुन्दर.
मानो मन लग गया उसका वही पर..
शुरूवात में उसकी कई तमन्नायें वहां पुरी होती नजर आ रही थी...
इतनी रफ्तार से जी रहा था के जिन्दगी
जैसे चंद पलो की मोहताज हो.
हर वक्त नये लोग.. नई दुनिया.. नये रिश्तें
सब कुछ हर दुसरे पल में नया..
सब कुछ इतनी सफाई से हो रहा था मानो पेहले से ही तय हो..
फिर वही मुसाफ़िर एक दिन अपनी जिन्दगी का हिसाब जोडने लगा और मात खा गया.
हाथ आया कुछ भी...नहीं पाया कुछ भी नहीं..
बस बेहिसाब जरूरते और तमन्नायें बेहिसाब....!
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment