कल तुम्हारे जाने के बाद सारा शहर मुझसे खफ़ा हो बैठा था
याद है वो रात जो हमने कभी इसी शहर की राहों पर गुज़ारी थी
शहर की कई मंजिला इमारतें मानो हमें झुककर सलाम कर रही थी.
चलते चलते जब हम हमारी पसंदीदा जगह पर आए
तो पाया कि आज भी वो जगह हमारे लिए खाली पड़ी थी
जैसे सदियों से हक हो हमारा उस पर
वहां से समुंदर कितना निराला लगता था
जैसे कुछ सवाल हमारे
कुछ उसके
आधे अधूरे छोड़कर उन्हीं के जवाब ढूंढता फिरता था
हर लहर को इतनी सादगी से पेश करता था
मानो देखनेवाले उसकी अंदरूनी हरकतों से वाकिफ़ ही न हों
फिर वहां से चलकर हम पूरे रास्ते
एक दूसरे का हाथ थामे
मरीन ड्राइव के दूसरे छोर पर चलते चले जाते
जहां रेत की कई निशानियां हमें जानी पहचानी छुअन का एहसास दिलाती थी
और सर्र से गुज़र जाती पैरों तले
फिर एहसास होता कि अब चलना चाहिए
देर जो हो जाती थी
आखिर समय भी किसी का हुआ है भला
यकीन नहीं आता तो देख लो
आज फिर तुम्हारे जाने के बाद सारा शहर मुझसे खफ़ा हो बैठा है...
11 comments:
Sahi bhai....
Ekdam Gulzar chi aathvan zali
khas karun Toranto ki raat ya kavitechi.......
Bhai ekdam sahi...
Gulzar chi aathvan aali....
Khas karu Toranto ki raat kavitechi...
Nice.......
Bhai ekdam sahi...
Gulzar chi aathvan aali....
Khas karun Toranto ki raat kavitechi...
Nice.......yaar
Aur aaj tumhare likhne ke baad, hame bolna pada...waaah waaah
zindagi bayan karne ka kaam jo kitabein nahi kar payi wo aap ki rachanaone kiya hai... shukriya Mahesh Babu...aap ki kalam yunhi chalati rahe, yehi dua hai hamari us rab se...
zindagi bayan karne ka kaam jo kitabein nahi kar payi wo aap ki rachanaone kiya hai... shukriya Mahesh Babu...aap ki kalam yunhi chalati rahe, yehi dua hai hamari us rab se...
Badhiyaa...
Badhiyaa
:-)
एक अनुभव को कविता का सुन्दर रूप देने के लिए बधाई!
अगदी खरं....
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