Sunday, February 19, 2012

तुम

मेरी आदतों को अब तुम बखूबी समझने लगी हो
मेरे कुछ कहने से पेहले ही आंखों से इशारे कर देती हो
जैसे तुम्हें मेरा हर अल्फाज़ मुंहजबानी याद हो
फिर भी तुम्हारी ख़ामोशी कई सारे सवालात छोड़ जाती है
मेरी नासमझ नज़रें नहीं समझ पाती तुम्हारे चेहरे की जुंबिश को..
शायद किसी जनम की पहेली हो तुम मेरे लिए
जिसे इस जनम में सुलझाना है मुझे...
कोशिश अच्छी कर लेता हूं ये भी जानती हो तुम
और उसी की खातिर हर बार नए सवाल छोड़ जाती हो..
कितनी आसानी से टाल देती हो मेरी गलतियों को
गलतियों का एहसास तो कोई भी करा देता है
पर तुम कभी-कभी उनको सुधार देती हो
बड़ा अच्छा लगता है जब तुम हंसकर कहती हो
कि तुम जैसे हो मेरे हो..
इतने विश्वास से कभी मैंने भी अपने आप से ये न कहा होगा
जो कुछ भी सुना था प्यार के बारे में कम था
आज महसूस किया है तुमसे मिलकर वो उससे कहीं ज्यादा बढ़कर है
फिर भी याद रखना मैं अपनी हरकतों से बाज न आऊंगा
जानता हूं मेरी आदतों को अब तुम बखूबी समझने लगी हो...

4 comments:

omibaba said...

mala mahiti aahe sandarbha kaay aahe

Vaidehi Shevde said...

:-)

Unknown said...

"कोशिश अच्छी कर लेता हूं ये भी जानती हो तुम
और उसी की खातिर हर बार नए सवाल छोड़ जाती हो.."

बेहद सुन्दर लाइने ...बधाई हो!

रजिया निसार said...

kya baat hai sir....bahut achha likha aapne...aapka ye hunar to hame pata hi nahi tha....:)