ले सर - सर हाथ में डोर पतंग की, हम भी दौड़ा करते थे,
ना धूप का डर ना छांव की आशा निर्भय खेला करते थे।
मार पीट भी एक खेल था, जब का तब हिसाब बराबर,
पीटे पिटाये सब मिलजुल कर एक थाली में चरते थे ।
तेरा मेरा हर बात में मसला, रोज की कीच कीच होती थी,
मिट्टी के बर्तन, सायकिल की चक्कर बारी - बारी मिलते थे ।
लुका छूपी, चोर पुलिस, कैरम, चेस और साप सीढ़ी,
इन सबके लिए था समय बहोत, मुश्किल से पढ़ते लिखते थे ।
नदियां, जंगल, कुंआ, नेहर इन सब से अपनी यारी थी,
भंवरा, तितली, चिड़िया, बुलबुल, खेल में साथ ही रहते थे।
अब भी सब कुछ मिल सकता हैं , नज़रिया ज़रा बदलना है,
ये निर्भर सब है सोच पर अपनी बूढ़े बाबा कहते थे।
ना धूप का डर ना छांव की आशा निर्भय खेला करते थे।
मार पीट भी एक खेल था, जब का तब हिसाब बराबर,
पीटे पिटाये सब मिलजुल कर एक थाली में चरते थे ।
तेरा मेरा हर बात में मसला, रोज की कीच कीच होती थी,
मिट्टी के बर्तन, सायकिल की चक्कर बारी - बारी मिलते थे ।
लुका छूपी, चोर पुलिस, कैरम, चेस और साप सीढ़ी,
इन सबके लिए था समय बहोत, मुश्किल से पढ़ते लिखते थे ।
नदियां, जंगल, कुंआ, नेहर इन सब से अपनी यारी थी,
भंवरा, तितली, चिड़िया, बुलबुल, खेल में साथ ही रहते थे।
अब भी सब कुछ मिल सकता हैं , नज़रिया ज़रा बदलना है,
ये निर्भर सब है सोच पर अपनी बूढ़े बाबा कहते थे।
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