Wednesday, November 21, 2018

कुछ पल

मेरे भाव खो गए हैं कही
अब मुझे रोना नहीं आता ।
छोटी-छोटी खुशियों से
आँखे जो छलक जाती थी
अब वो निर्जल है, तृष्णा से भरी,
क्रोध से अस्वस्थ,
लालसा, वासना से धुंधली !

कुछ पल थे
जिन का स्मरण हो तो आँखे भर आती थी...
फूट-फूट के रोया करती थी...
चित्त-मन आक्रोश करता था
देर तक बहोत देर तक,
अब तो बस सिर्फ अफ़सोस रहता है खोकला, बेजान..!
मन रिक्त हो जाता ..!
नया पन आ जाता था
आँखों से मुक्त होकर बहते भावों से...!!!
कभी बड़ो के संग बड़ा हो जाते
तो कभी बच्चो संग बावले
बडे निर्मल थे वो भाव..!!
पाने-खोने, मुनाफे के
हिसाब से बढ़कर
थे वो भाव..!
स्वाभिमान और सम्मान से
बढ़कर थे जो भाव
मेरे ख़ुद से कई गहरे,
ऊँचे थे वो भाव..!
मेरे भाव खो गए हैं कही
अब मुझे रोना नहीं आता ।

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