पुन्हा एकदा..
Monday, April 2, 2018
नहीं लगता
दश्त-ए-दरख्तों में नहीं लगता
ये दिल अब परबतों में नहीं लगता।
तसल्ली मिले, जिंदगी मुक़म्मल हो,
दम ऐसा अब हसरतों में नहीं लगता।
कभी अमावस तो कभी पूनम की रात,
कुछभी नयापन इन करवटों में नहीं लगता...
!
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