ग़ज़ल ये तुमको मैं अता करता हूँँ
और क्या-क्या दे सकूँँ पता करता हूँँ
और क्या-क्या दे सकूँँ पता करता हूँँ
हर वक्त नहींं रहती मोहब्बत सीने में
कभी-कभी मैंं बस फर्ज़ अदा करता हूँँ
मैं, मेरी सच्चाई, मेरा वजूद और ये जहाँँ
जाने इन बातों मेंं क्यूँँ वक्त ज़ाया करता हूँँ
बह जाता हूँँ बहाव में समजदारी के अक्सर
बार-बार ना जाने क्यूँँ मैं यही ख़ता करता हूँँ
ग़ज़ल, संगीत, शायरी और दीदार तेरा
आज कल बस इन्ही बातो का नशा करता हूँँ
तुम करो दंगे फसाद, मोहल्ले जला दो
मैंं ख़ामोशी से अक्सर अमन बयान करता हूँँ
कभी-कभी मैंं बस फर्ज़ अदा करता हूँँ
मैं, मेरी सच्चाई, मेरा वजूद और ये जहाँँ
जाने इन बातों मेंं क्यूँँ वक्त ज़ाया करता हूँँ
बह जाता हूँँ बहाव में समजदारी के अक्सर
बार-बार ना जाने क्यूँँ मैं यही ख़ता करता हूँँ
ग़ज़ल, संगीत, शायरी और दीदार तेरा
आज कल बस इन्ही बातो का नशा करता हूँँ
तुम करो दंगे फसाद, मोहल्ले जला दो
मैंं ख़ामोशी से अक्सर अमन बयान करता हूँँ
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