Monday, June 8, 2009

तनहाईया

मेरी तनहाईयो को मुझसे यूं जुदा ना करो
मेरे साथ भला और कौन रेह पायेगा,

मुझसे ना कर वफा ऐ मेरे सनम
तेरी बेवफाई को ये दिल न सेह पायेगा,
मेरे साथ भला और कौन रेह पायेगा,,.....

वो तो मुस्कुराकर हर गम टाल देते है
इसतरहा गममे कौन मुस्कुरा पायेगा,
मेरे साथ भला और कौन रेह पायेगा,,.....

वा मेरे यार तेरी यारी को सलाम
मेरी बदनामी और कौन सेह पायेगा,
मेरे साथ भला और कौन रेह पायेगा,,.....

मुस्कुराते वो मुझसे युं जुदा हुये
उनको था यकींन ये अकेला रेह् पायेगा
मेरे साथ भला और कौन रेह पायेगा,,.....


मेरी तनहाईयो को मुझसे यूं जुदा ना करो
मेरे साथ भला और कौन रेह पायेगा,,....

3 comments:

pramod said...

आपकि रचना पढकर तनहाई भी इतनी खूबसूरत हो सकती यह ज्ञात हुआ.आप ऐसी ही रचनाए करते रहेंगे तो वाकई में किसी को भी तनहाई से प्यार हो जाएगा.शुक्रिया इस रचनओं के लिए.

Nivyedita said...

wonderful poems .shows the reflection of your specifications.the words brodly reveal the state of mind..and leaves readers mind to think beyond the conventional meaning of solitude...
truely thoughtful collection of poems..
will be waiting to read more poems on your blog

HAREKRISHNAJI said...

kya baat hai, bahut khub