Saturday, April 1, 2017

किस्से

खिलखिलाती धूप को मोहताज़ तू हो जायेगा,
ज़िंदगी की साँस पर हर जुर्म फिर खिल जायेगा।
यूँ हो रहा है आदमी कैसे सनम मेरे खुदा,
कि भूल कर भी न मिटे वो फासला हो जायेगा।

फिर भी सारे किस्से यूँ मिट्टी में मिल जाएंगे,
ज़िंदगी जो थी हसीं वो फिर गुनाह हो जायेगी।
गर हो सके तो मौत से मिलना तुम यूँ ही कभी,
और हँसते खिलखिलाते गुमशुदा हो जायेगा।

अपनी अपनी चाहतो का सबको ही है एक नशा,
फिर ख़ुशी के वास्ते कोई भी जी न पायेगा।
हो गए है जिंदगी से दूर कितने फासले,
की साँस की हर लय को फिर कैसे तू दोहरायेगा।

जो हकीक़त न रही है उसको फिर हो मलाल क्यूँ,
चाँद तेरा चाँदनी से कब मिला मिल पायेगा।
है खुशनुमा तो जिंदगी भी हो ख़ुशी से यूँ बसर,
बीती बातें सोच कर तू फिर वही दोहरायेगा।

2 comments:

Unknown said...

बेहद उम्दा👍

Unknown said...

बेहद उम्दा👍